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खो चुका हूँ

Anil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जरा पागल हूँ,दिल का बावरा हूँ
        
                                                    
                            
बहुत पाया बहुत कुछ खो चुका हूँ।

वो दिन लगते बहुत अच्छे हैं मुझको
पलट कर जब भी बचपन देखता हूँ।

मिरी ख़ामोशियाँ ज़िद्दी बहुत हैं
हमेशा अब कहाँ मैं बोलता हूँ।

हरिक जानिब मिटाने को अँधेरा
चरागाँ कर रहा था कर रहा हूँ।

बसा हूँ शहर में जबसे अनिल मैं
कहा सबने कि पत्थर हो गया हूँ।
-पंडित अनिल
3 महीने पहले
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