विज्ञापन

भारत की जीवित स्वाभिमानी वाणी।

Anil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दो उजले पदचिह्न
        
                                                    
                            

साबरमती के तट पर जैसे
भोर उतरती धीमे-धीमे,
वैसे गांधी का सत्य जगा था
सोए भारत के हर सीने में।

उनकी आवाज़—नदी की धारा,
जो पत्थर से भी राह बनाती,
नफरत के तपते मरुस्थल में
करुणा की वर्षा बरसाती।

और शास्त्री—जैसे खेतों में
पहली वर्षा की गंध उतरती,
छोटे कद में बड़ा हौसला,
भारत की धड़कन बन धड़कती।

उनके शब्द नहीं केवल नारे,
वे श्रम-सूरज की स्वर्ण किरण थे,
सीमा पर जागे प्रहरी जैसे,
खेतों में झुकते श्रम के चरण थे।

एक ने मन का अंधकार हरकर
सत्य-सूर्य आकाश में बोया,
दूजे ने श्रम की माटी से फिर
आत्मनिर्भरता का बीज संजोया।

दो युगपुरुष—दो दीप अनोखे,
दो दिशाओं के उजले पथ थे,
एक अहिंसा की शीतल छाया,
दूजा संकल्पों का हिमपर्वत थे।

आज समय के शोर में जब भी
मूल्य कहीं धुँधलाने लगते,
गांधी की अंतर-ज्योति कहती—
“सत्य बचाओ”,
शास्त्री के पदचिह्न कहते—
“श्रम से भारत गढ़ते रहो।”

इन दोनों की स्मृति नहीं बस
इतिहासों में बंद कहानी,
इनसे ही तो अर्थ पाती है
भारत की जीवित स्वाभिमानी वाणी।
-पंडित अनिल
5 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

13199 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10960 कविताएं

View Profile

Ramjeet pal

2388 कविताएं

View Profile