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रुचियों का कत्ल

अनिल कुमार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंदर रोना बाहर हंसना, दुविधा ऐसी कहीं ना जाए,
        
                                                    
                            
खाना पीना हंसना मिलना, फिर भी अंतरतम मुरझाए।
रुचि रेंचो की काम मेडिसिन, कैसे पेशेंट देखा जाए,
माता-पिता को डर लगता है, फिर भी बेटा कोटा जाए।
बेटे से कोई न पूछे, उसके सपने मरते जाए...
सचिन क्रिकेट,में रमन भौतिकी,अर्थशास्त्र ना उन्हें सुहाय,
रुचियों पर जब वापस आए, तब नोबेल भारत आ जाय
ऐ पी जे की रुचि थी गगन में, उन्हें गरीबी रोक न पाए,
भारत के जन-जन तक पहुंचे, नाम 'मिसाइलमैन' कहाय।
किरण मजूमदार की रुचि में, गया शरीर-विज्ञान समाय,
मिला साथ परिवार का देखो, दीन्ही 'बायोकान' बनाय।
रामानुजन का दिल धड़के, गणित उन्हें बहुतय प्रिय भाय,
जो कुछ हासिल किया उन्होंने, आंखों में आंसू आ जाय।
मिला साथ यदि उनको होता, आसमान में जाते छाय
रवींद्रनाथ जी को घर वाले, रहे कानून का पाठ पढ़ाय,
उनकी रुचि साहित्य में बसती, रमते थे संगीत में जाए।
पहला नोबेल रुचि ने उनकी, भारत को दींन्हा दिलवाय,
शांतिनिकेतन देन उन्ही की, रुचियों को मरने दे नाय।
आइंस्टीन को क्लर्क की कुर्सी, है कांटों से भरी दिखाय,
फिर भी रुचि को वे ना छोड़े, सापेक्षता नोबेल ले आय।
रुचि-व्यक्तित्व देन ईश्वर की, उसको कभी छीनना नाय,
प्रेम करो यदि तुम स्वजनों से, अंतर्मन में देखो जाए,
कभी विवश मत उनको करना, अपने सपने उन्हें बताए।
अनुशासन, शिक्षा है जरूरी, मन से दो जितना बन पाए,
लेकिन 'तुम्हें यह करना ही है', सोच बुरी है रहे बताए।
उसके सपने खुला है अंबर, उड़ने दो मत रोको भाय,
जीवन के इस विवश शास्त्र को, ए के वर्मा रहे बताए।
एक महीने पहले
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