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तुम्हारे अंधेरों को अपनाया है मैंने...

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम्हारे अंधेरों को अपनाया है मैंने
        
                                                    
                            

मेरे उजालों को
अपना कहने वाले,
तुम्हारे अंधेरों को भी
अपनाया है मैंने।

तुम जब कभी भटके
राहों के मोड़ पर,
थामकर उँगली तुम्हारी
साथ चलाया है मैंने।

तुम्हारी ख़ामोशियों में
छिपे दर्द को पढ़कर,
हर अनकहे एहसास को
दिल से समझाया है मैंने।

हम दोनों की बेरुख़ी का
ये कैसा आलम है,
अपनी सादगी को ही
सितमगर बताया है मैंने।

कहा-सुना तुमने,
शिकवे भी किए बेहिसाब,
तुम्हारी हर शिकायत को
मुस्कुराकर सराहा है मैंने।

तुमने जो खोया,
उसे अपना समझकर,
अपने हिस्से की खुशियाँ भी
तुम पर लुटाया है मैंने।

रिश्ते तो वही हैं
जो दर्द में साथ दें,
इसीलिए हर आँसू को
अपना बनाया है मैंने।

आओ, एक-दूसरे से
अदला-बदली कर लें दिल की,
कुछ तुम्हारा दर्द रख लूँ,
कुछ अपना दर्द दे दूँ।

क्योंकि प्रेम सिर्फ़
उजालों का नाम नहीं होता,
तुम्हारे अंधेरों में भी
एक दीप जलाया है मैंने।

तुम मेरे थे,
ये कहने से कहीं बढ़कर—
तुम्हें तुम्हारी हर कमी समेत
अपनाया है मैंने...
-आचार्य अमित
2 महीने पहले
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