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कविता

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उस दिन तुम्हारे जाने के बाद
        
                                                    
                            
मैंने न चाहते भी
गिर जाने दी थी
अपने हाथों से कलम, सोच लिया
अब नहीं लिखूंगा
तुम्हारी याद में कोई कविता

यह जिद भी छोड़ दूंगा कि
एक पुस्तक मुकम्मल करूंगा
उन कविताओं से
जो लिखता हूँ, बस तुम्हारे लिए

नहीं बदलूंगा हर दिन
गुलदस्ते का बासी फूल
ताज़े फूल बहकाते हैं
मन को
कविता लिखने के लिए

मैं जीना चाहता हूँ अब
उन लोगों की तरह
जो कविता लिखने की
जद्दोजेहद में
बार बार पलायन नहीं करते
अतीत के धुंधले गेह में

मैं चाहता हूँ जैसे बने
छुड़ा लूं कविता करने की लत
माना यह लत
इतनी गहरा चुकी है कि
छुटना सहज नहीं
मगर, कुछ तो होगा विकल्प
कोई तो होगा जिसने
निजात पाई होगी
कविता लिखने की लत से
पहले कभी

नहीं, मेरी मुश्किल
कविता नहीं है
कविता लिखने में कोई परहेज नहीं
मगर, तुम्हारी याद में
कविता कर थक चुका है मन
एकरसता सी आने लगी है
उन कविताओं में
जो लिखता हूँ तुम्हें याद कर।
- अमित कुमार मिश्रा
4 दिन पहले
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