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जब प्रेम ही इबादत है

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब प्रेम ही इबादत है
        
                                                    
                            

जो उनसे शिकवा किया दिल,
तो कैसा है प्यार येह...
तड़प उठी जो यादों की तेरी,
मेरा दिल फिर क्यों है बेकरार रहे...
तेरी दूरी में भी तेरा ही नूर है,
तेरी खामोशी में भी तेरा इकरार रहे...
जो उनसे शिकवा किया दिल,
तो कैसा है प्यार येह...
खुदी को गिराकर
खुदा तुम्हें बनाया है,
अपना सब कुछ लुटाकर
इमान तुम पर लाया है।
मेरी हर वफा की धड़कन में
तेरी ही सदाएं हैं,
मेरी हर सांस की राहों में
तेरी ही दुआएं हैं।
मेरी रूह को छुकर
जब तेरी याद आती है,
सूनी हुई जिंदगी भी
फिर से मुस्कुराती है...
जो उनसे शिकवा किया दिल,
तो कैसा है प्यार येह...
तुमको पता है,
सबको खबर है,
साथ हमारा
दो जहान का सफर है।
तुम जो मिलो,
तो जग मिल जाये यारा,
तुम जो मिलो,
तो रूह को मिल जाये किनारा।
ये यारी नहीं,
रब की दी हुई सौगात है,
ये रिश्ता नहीं केवल,
जिंदगी की रूहानी बात है।
तू मिले तो मुकम्मल हूँ मैं,
तू बिछड़े तो भी तेरा ही रहूँ,
प्रेम अगर इबादत है मेरी,
तो हर जनम तुझे ही कहूं...
अब शिकवा भी तुझसे कैसा,
जब तू ही मेरी दुआ है,
दर्द भी तेरा, खुशी भी तेरी,
तू ही मेरा रास्ता,
तू ही मेरी मंजिल,
तू ही मेरी रूह की सदा है।
जो उनसे शिकवा किया दिल,
तो कैसा है प्यार येह...
शिकवा जहां मिट जाता है,
वहीं से शुरू होता है
सच्चा प्यार येह...
आचार्य अमित
2 महीने पहले
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