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जान अपनी कहाँ है, यारों

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक आत्ममंथनात्मक व्यंग्य
        
                                                    
                            

जान अपनी कहाँ है, यारों,
माँ-बाप की दी हुई सौगात है।
रब का शुक्राना बाकी है,
हर साँस पर उसकी इनायत है।

रिश्तों का जो मान मिला,
वो अपनों की मोहब्बत है।
दोस्तों की दुआओं से ही तो,
ज़िंदगी में कुछ राहत है।

बुज़ुर्गों की आशीषों का,
सिर पर अदृश्य हाथ है।
फिर भी इंसान को देखो,
अपने होने का कितना गुमाँ साथ है।

न जाने कितने चेहरों की दुआएँ,
कितनी उम्मीदें, कितने एहसान हैं।
फिर भी कहते हैं हम अक्सर—
"हम तो आखिर हम हैं!"

ज़रा सोचो ऐ इंसान,
किस बात पर इतना अभिमान है?
जिस मिट्टी से बने हो तुम,
उसी मिट्टी में एक दिन स्थान है।

हमसे उलझे न कोई—
ऐसा अहंकार पालते हैं,
भूल जाते हैं कि पत्थर भी
समय के हाथों घिस जाते हैं।

जो चट्टानें अडिग लगती हैं,
वो भी टूटकर रास्ते बनाती हैं।
पर्वत भी झुकते हैं कभी,
नदियाँ भी दिशा बदल जाती हैं।

झरने अपनी धुन में बहते हैं,
पतझड़ भी फिर सावन बनता है।
हर अंधेरा एक दिन मिटता है,
हर बुरा समय पावन बनता है।

संगीत तो प्रकृति का उपहार था,
हमने ही शोर में खो दिया।
जिस जीवन को प्रेम से सजाना था,
उसे अहंकार में बो दिया।

याद रख ऐ मानव—
तेरा कुछ भी अकेला तेरा नहीं,
तेरी पहचान में अनगिनत
हाथों का योगदान है।

विनम्र रह, कृतज्ञ रह,
क्योंकि यही जीवन का
सच्चा सम्मान है।
-आचार्य अमित
3 महीने पहले
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