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कैसा अभिमान!

Amit Ji

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समतल हो गई जल से धरती,
        
                                                    
                            
उढान पर है जल-प्रवाह।
जिधर चाहती, नदी घूमती,
घर, पेड़, मिट्टी सब देती ढाह।

नदी हो गई बावली,
दिशाहीन दोहावली।

बेकाबू हो गया जल का उफान,
सीमाएँ तोड़ता है तूफान।
हाहाकार मची है हर जगह,
समय बड़ा है बलवान।

रौद्र रूप, मद में चूर हुई है धारा,
नदियों पर आया यह कैसा गुमान?
देखकर प्रकृति का यह तांडव,
सहमा-सहमा है इंसान।
कब थमेगा यह घनघोर वर्षण?
मेघ पे आया कैसा अभिमान!
एक महीने पहले
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