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एक सैनिक की रात

Alok kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रात संसार पर अपना पहरा पहरा बैठा देती है।
        
                                                    
                            
सबको अपने कदमों की आहट पर सुला देती है।
जब होती है एक सैनिक से उसकी मुलाक़ात।
सैनिक की चौकस आंखों से रात करती है संवाद-
ऐ आँख! तू अभी तक क्यों जगती है ?
क्यों नहीं रात की लोरी का स्वाद चखती है?
बड़े शांत भाव में सैनिक की चौकस आंखें।
रात से करती हैं अपने फ़र्ज़ की बातें ,
ऐ रात! हमारे हवाले सीमा की पहरेदारी है।
हमको तो करनी अपने वतन की रखवाली है।
अभी फर्ज की राह में जगने का वक्त है।
सो लेंगे जब कभी सोने का वक्त होगा।
अभी सोती हुई बस्तियो की हमें चाभी संभालनी है।
तू चल तेरी बात हमको नहीं मांननी है
- राजलक्ष्मी राज
एक महीने पहले
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