विज्ञापन

भार्गव राम खण्डकाव्य

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भार्गव राम ने सब विधि जाना,
        
                                                    
                            
अन्याय हुआ नहि सीय स्वयंबर।
पवित्र संकल्प देख राजा जनक,
जामद्गन्य संतुष्ट हुये सीय स्वयंबर।।

भार्गव राम के कंधे था धनु,
पास बुलाया दशरथी राम।
लो पितु से पाया सारंग धनु,
संधान करो तुम अभी राम।।

चरण रज धरि अरु आशिष पाइ,
दोनों कर लीन्हा धनु सारंग राम।
खींचा चाप ज्योंही ही तीर चढ़ाइ,
थे गद गद हो गये जमदग्नि राम।।

सारंग धनु दादा ऋचीक विष्णु से,
दादा ऋचीक दीन्हा पितु मेरे को।
मुझे धनु मिला पितु जमदग्नि से,
अब राघव राम को पारितोषिक में।।

सारंग धनु सदा रहा न्याय साथ,
ऐसा सोच सौंप दिया राघव राम।
वापस गिरि हुये जमदग्नि राम।
तप में लीन हो गये भार्गव राम।।
 
6 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12618 कविताएं

View Profile

Nathuram Kaswan

8654 कविताएं

View Profile