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सही जगह नहीं पहुंचा

Akash Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी आँखें ताउम्र उसकी राहें निहारती रही
        
                                                    
                            
मेरे पास कभी इंतजार ए शख्स नहीं पहुंचा

दिल की बात जो उसके हक में लिखी थी
वो खत जो कभी सही पते पर नहीं पहुंचा

एक दिन यूं ही घर से निकल आया मै
मुड़कर फिर कभी अपने घर नहीं पहुंचा

कितना आसाँ था मेरे तक आ जाना
कदम बढ़ाए उसने मगर कभी दिल तक नहीं पहुंचा

जो मिला उसे मैने अपना मान लिया
मागने की ख़ातिर कभी खुदा के दर नहीं पहुंचा

याद आती है मां की रोटिया रात में
निवाला मुंह तक गया मगर कभी पेट तक नहीं पहुंचा

गाँव से निकल आया था मैं बचपन में ही
मैं तो लौट आया मगर कभी बचपन नहीं पहुंचा

गौर किया तो समझ में आया गौतम
जिंदगी में कुछ भी कभी सही जगह नहीं पहुंचा
 
5 दिन पहले
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