नेकी करते हो तो करते रहो परवाह नहीं,
मुझपे उँगली उठाओगे तो फिर बुरा होगा।
पुरा आसमान तुम्हारा है उड़ने की खातिर,
ये जमीं छोड़ दो मुझको गिरने की खातिर।
राह आसमां में बनाते हो बनाते रहो परवाह नहीं,
मेंरी राहों में आओगे तो फिर बुरा होगा।
नेकी करते हो ..............
यूं तो हम से जियादा कोई गिर नहीं सकता,
अपनी जुबां से कोई हम सा फिर नहीं सकता।
सन्मार्ग पे चलते हो तो चलते रहो परवाह नहीं,
पाठ सत्य का पढ़ाओगे तो फिर बुरा होगा।
नेकी करते हो ..............
नाज परवाज पर किया तो पर से जाओगे,
हमसे जो उलझे तो अपने ही घर से जाओगे।
रहनुमा बनते हो बनते रहो परवाह नहीं,
मेरी हकीकत बताओगे तो फिर बुरा होगा।
नेकी करते हो ..............
यहाँ बुरों को बुरा कह दिया क़यामत है,
सुनो पर बोलो नहीं बोला तो अदालत है।
जख्म खाते हो तो खाते रहो परवाह नहीं,
कभी मरहम जो मांगोगे तो फिर बुरा होगा।
नेकी करते हो ..............
चंद सिक्कों में हम ईमान बेच देते हैं,
ईमान क्या चीज है पहचान बेच देते हैं।
धर्म और जाति में बँटे हैं क्या आगाह नहीं?
यूँ ही आपस में बंटोगे तो फिर बुरा होगा।
-अजीत कुमार