विज्ञापन

ख़ामोशी की उस हर लहर का

अजय कुमार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तू फ़िक्र न कर,
        
                                                    
                            
तू बेफ़िक्र रह,
ये सब इल्ज़ाम तो मुझे ही झेलना है।

तू ज़िंदगी के हर लम्हे
ख़ुशियों को माहौल में बोता रह,
विरह की अग्नि में तो बस
मुझे ही तपना है।

करवटें चाहे कितनी बार भी ले ज़िंदगी,
क्या फ़र्क़ पड़ता है?
हर साँस में मेरा ही तो दिल धड़कता है।

तू हर सितम से दूर रह,
हर सितम का सामना तो
मुझे ही करना है।

ख़ामोशी की उस हर लहर का
आभास है मुझे,
तू यूँ ही ख़ामोश रहा कर,
हर ख़ामोशी का जवाब
मुझे हँसकर ही देना है।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7473 कविताएं

View Profile