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या इसलिए कि खोज चलती रहे?

ABHISHEKANAND

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी डायरी में लिखे कुछ वाक्य मुझे देखते हैं और कहते हैं—
        
                                                    
                            
“तुम अधूरे हो।”

मेरे कमरे में रखी कुछ पुरानी डायरियाँ,
जिनके कई पन्ने अब भी खाली हैं,
मुस्कुराकर कहती हैं—
“तुम अधूरे हो।”

वे किताबें,
जिनके बीच में कलम रखकर
मैंने आगे पढ़ना टाल दिया था,
हँसती हैं मुझ पर और कहती हैं—
“तुम अधूरे हो।”

वो बातें,
जो उस एक से कभी कर नहीं पाया;
और शायद कर भी नहीं पाएंगे,
आज भी भीतर कहीं रह-रह कर उठती हैं
और धीरे से कहती हैं—
“तुम अधूरे हो।”

पर एक दिन मैंने इन सब से पूछा—

बताओ,
क्या पूरा है इस जग में?

क्या डायरियों के सारे पन्ने भर देना ही पूरा होना है?

क्या हर किताब को अंत तक पढ़ लेना ही पूर्णता है?

क्या मन की सारी उलझनों का मिट जाना ही संपूर्णता है?

या फिर किसी एक व्यक्ति से अपने आप को जोड़ लेना?

यदि यही पूर्णता है,
तो फिर हमारे बनाने वाले का क्या?

जिसने इस पूरे ब्रह्मांड को गति दी,
जिसने इच्छाएँ दीं,
खोज दी,
प्रेम दिया,
प्रश्न दिए—

क्या उसने यह सब इसलिए बनाया
कि सब कुछ पूर्ण हो जाए?

या इसलिए कि खोज चलती रहे?
एक महीने पहले
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