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मेरे प्रिय, तुम मुझे समझाओ

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मग्न हूँ खुद में, पर किसी की आँखों में,
        
                                                    
                            
अब मैं वो आँसू कहाँ से लाऊँ?
क्या मेरी हैसियत महज़ एक मक्खी जैसी थी,
कि हर व्यक्ति को बस व्यथा ही दे जाऊँ?
अथवा नहीं, क्या जानूँ मैं?

ये जो बेड़ा है तेरी बदमाशियों का,
इसकी परिभाषा मैं कहाँ ढूँढूँ?
तेरी इन आँखों में देखते-देखते,
क्या मैं कोई नई उथल-पुथल कर जाऊँ?

मैं सच में कुछ भी नहीं जानती,
इसलिए अब तुम मुझसे कुछ ना कहना।
पर मेरी गलती क्या है आख़िर,
तुम मुझे अब ये तो समझाओ?
मेरे प्रिय... तुम मुझे समझाओ!
एक महीने पहले
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