विज्ञापन

एक पहर बीत गया

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक पहर बीत गया,
        
                                                    
                            
अब दूसरे की बारी।
नफरत पैदा कर रहे हो,
अब इसकी बारी।

इसके पैर नहीं,
नहीं है कोई नब्ज,
नफरत ढूंढती,
इसे नहीं।

तुम क्या हो,
तुम सोच रहे।
पहर न बीते,
कुछ कर लो।

भोर का उच्चतम,
कामयाब रहा है।
सुबह न खिले,
ये पहर।
1 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12618 कविताएं

View Profile

Nathuram Kaswan

8654 कविताएं

View Profile