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ग़ज़ल

Abdul Hameed

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुड़ के पीछे न इक नज़र देखा
        
                                                    
                            
दाँव अपना जो बे असर देखा

कथनीकरनी मेंफ़र्कहो जिनकी
उनका भाषण डगर मगर देखा

मयक़दे की तरफ़ बढ़े जब पग
ग़ौर से  तब  इधर  उधर देखा

वक्त करवट बदल रहा हरदिन
ज़ेर को आज फिर ज़बर देखा

आम जन की खबर नहीं  लेती
आज सत्ता  को  बे खबर देखा

अहमियत आबकी तभी जानी
सूखता जब कहीं शजर देखा
-हमीद कानपुरी
 
एक महीने पहले
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