कभी गुलाब कभी गेंदा कभी कॅंवल बन कर!
मिरे होंटों पे चली आती है वो ग़ज़ल बन कर!!
उस के इश्क़ में पागल मैं जब आगरा पहुॅंचा!
वो खड़ी हॅंस रही थी मुझ पे ताजमहल बन कर!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद