विज्ञापन

कभी गुलाब कभी गेंदा कभी कॅंवल बन कर

Aalam-e-Ghazal Parvez

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी गुलाब कभी गेंदा कभी कॅंवल बन कर!
        
                                                    
                            
मिरे होंटों पे चली आती है वो ग़ज़ल बन कर!!
उस के इश्क़ में पागल मैं जब आगरा पहुॅंचा!
वो खड़ी हॅंस रही थी मुझ पे ताजमहल बन कर!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
9 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10067 कविताएं

View Profile