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हम मिल के नहीं मिलते कैसी मजबूरी है

Aalam-e-Ghazal Parvez

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम मिल के नहीं मिलते कैसी मजबूरी है!
        
                                                    
                            
जो कह न सके तुम से कहना भी ज़रूरी है!!

उठे जब भी क़दम मेरे वो तेरी जानिब था!
हम तुम तक नहीं पहुॅंचे ये कैसी दूरी है??

ऐ जान-ए-तमन्ना तुम इक बार तो आ जाओ!
मुलाक़ात अधूरी है हर बात अधूरी है!!

दुनिया की हर इक शय में मुमकिन है अधूरापन!
ऐ हमदम! मिरी उल्फ़त अपने आप में पूरी है!!

कोई नहीं ऐसा जिस ने न किया हो इश्क़!
सभी कहते हैं फिर भी ये इश्क़ फ़ितूरी है!!

'परवेज़' ये चढ़ जाए तो उतरता नहीं सर से!
ये नहीं ऐसा वैसा ये नशा अंगूरी है!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
4 महीने पहले
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