कोई बताएगा क्या है इन नौजवानों की ख़ता?
क्या बेरोज़गारी है इन के पढ़ने लिखने की सज़ा??
ग़ुर्बत है भूख है वालिदैन हैं बीमारी में मुब्तला!
खाने को नहीं है रोटी कहाॅं से आएगी दवा??
जो कल तलक ग़रीब था अब कंगाल हो चुका है!
ग़रीबों को देखो दिखेगी तुम्हें विकास की छटा!!
हम जिन्हें समझते थे अपना रहनुमा राहज़न हैं वो!
इन की नीयत में खोंट है इन की फ़ितरत में है दग़ा!!
हम करें भी तो क्या करें? बढ़ें भी तो किधर बढ़ें?
जब रास्तों की न हो ख़बर न मंज़िल का हो पता!!
बद से बद-तर हो रहे हैं देश के हालात यारों!
इस चुनाव में बता ही दो कि हम चाहते हैं क्या!!
जहाॅं सच बोलना है मैं वहाॅं कुछ सोचता नहीं!
जो भी कहता हूॅं 'परवेज़' वो मैं कहता हूॅं बरमला!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद