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Urdu Poetry: ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना
        
                                                    
                            
पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना

गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था
अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना

मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन
अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना

ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुकम्मल हो जाए
उस को ख़ंजर जो दिया है मुझे सर भी देना

~ मेराज फ़ैज़ाबादी

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4 महीने पहले
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