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आसिफ़ मिर्ज़ा: दिखावे की मोहब्बत से सुनहरे पल नहीं आते

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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दिखावे की मोहब्बत से सुनहरे पल नहीं आते
कभी भी झूट की डाली पे सच्चे फल नहीं आते

सभी के फ़ैज़ की ख़ातिर ही ये बरसात होती है
किसी की चार-दीवारी में तो बादल नहीं आते

मिरी कड़वी ज़बाँ से तुम मिरी पहचान मत करना
मुझे ग़ुस्सा तो आता है मगर छल वल नहीं आते

तुम्हें मिलने की ख़्वाहिश ही यहाँ तक खींच लाती है
वगर्ना कौन जाता है जहाँ सिगनल नहीं आते

तिरी यादों ने इस दिल को कुछ ऐसे बाँध रक्खा है
अकेले भी अगर दौड़ें तो हम अव्वल नहीं आते

यहाँ बैठो हमारे पास में बातें करो हम से
चले जाते हैं जो इक बार फिर वो पल नहीं आते

अगर हल जानते हो फिर तुम्हें ये मुश्किलें क्या हैं
उन्ही को दिक्कतें होती हैं जिन को हल नहीं आते

सताना बे-ज़बानों को तुम्हें भारी न पड़ जाए
तुम्हारे रास्तों में क्या कभी जंगल नहीं आते

कई हुश्यार आते हैं हमें पागल बनाने को
हमेशा पागलों के भेस में पागल नहीं आते

बहू बेटी हमारी रिज़्क़ को माथे लगाती है
हमारे पाँव के नीचे कभी चावल नहीं आते

किसी का मर्तबा कोई भी कैसे छीन सकता है
हरे होते भी हैं तो सबज़ियों में फल नहीं आते

पहन के हम इन्हें बचपन तिरे कूचे में आ जाते
मगर अब पाँव में छोटे से ये चप्पल नहीं आते
 
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2 महीने पहले
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