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अब्दुल्लाह नदीम: दीवाना तिरे हिज्र में मर जाएगा इक दिन

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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मुश्किल से समेटा है बिखर जाएगा इक दिन
दीवाना तिरे हिज्र में मर जाएगा इक दिन

हम कुलबा-ए-अहज़ाँ में ही रह जाएँगे बैठे
वो शहर से हो कर भी गुज़र जाएगा इक दिन

ये वक़्त जो दरियाओं की मानिंद रवाँ है
तुम देखना ये वक़्त ठहर जाएगा इक दिन

ढूँढ़े से कोई वज्ह-ए-जुदाई न मिलेगी
बस तुझ से यूँही दिल मिरा भर जाएगा इक दिन

हम ख़ाक ब-सद-शौक़ उड़ाते हैं अभी तो
वहशत का ये दरिया भी उतर जाएगा इक दिन

वो तीरा-शबी होगी जहानों पे मुसल्लत
सूरज भी निकलते हुए डर जाएगा इक दिन

बैठे हैं सँभाले हुए हम साँस की गठरी
मा'लूम है ये रख़्त-ए-सफ़र जाएगा इक दिन हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

4 सप्ताह पहले
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Sanjai kumar

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