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कैफ़ी के जिस शेर से नाराज़ हुई थीं शौक़त उसी से शुरू हुई थी प्रेम-कहानी भी

काव्य डेस्क

Sahitya
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कैफ़ी आज़मी जब भी मुशायरों में आते थे तो लोगों की दाद नहीं रुकती थी। वह प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य थे और समाज को लेकर अपनी लेखनी मुखर रखते थे। कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनने के बाद वह उन्हीं के बनाए कम्यून में रहा करते थे। वहीं शबाना और बाबा का जन्म भी हुआ था। उनकी बेग़म शौक़त कैफ़ी ने उनका हर स्थिति में साथ दिया। कैफ़ी ने भी अपनी बीबी को प्रेरणा मान कर कई नज़्में कहीं, 'औरत' उन्हीं नज़्मों में से एक है। 



लेकिन कैफ़ी और शौक़त की मुलाक़ात का क़िस्सा भी दिलचस्प है। जब शौक़त ने पहली बार कैफ़ी को देखा तो वह मुशायरे में ग़ज़ल सुना रहे थे। इसके बाद जब वह स्टेज से उतरे तो ऑटोग्राफ़ लेने के लिए उनके आस-पास कॉलेज की लड़कियों की भीड़ लग गयी थी। यह देखकर शौक़त पहले अली सरदार जाफ़री से ऑटोग्राफ़ी लेने चली गयीं। उन्हें वहां जाते हुए कैफ़ी ने कनखियों से देख लिया। भीड़ कम होने पर जब शौक़त कैफ़ी का ऑटोग्राफ़ लेने आईं तो उन्होंने शेर लिखा

वही अब्रे-जाला चमकनुमा वही, ख़ाके-बुलबुले-सुर्ख़-रू ज़रा
राज़ बन के महल में आओ, दिले घंटा तुन तो बिजली कड़के धुन
तो फबन झपट के लगन में आओ 

इस शेर पर शौक़त नाराज़ होकर कैफ़ी साहब से पूछा कि उन्होंने ऐसा शेर उनकी डायरी में क्यूं लिखा। इस पर कैफ़ी ने जवाब दिया कि क्यूंकि शौक़त पहले सरदार जाफ़री से ऑटोग्राफ़ लेने चली गयीं थीं। यहां से शुरु हुई कैफ़ी और शौक़त की प्रेम कहानी। 
2 वर्ष पहले
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