उसके ही हो गए हम, जो न सका हमारा,
कैसा था ये इश्क़ भी, कैसा था ये सहारा।
जिसे अपना समझकर दिल की हर बात सौंप दी,
वही बनकर रह गया किस्मत का एक किनारा।
वो साथ चल न सका मेरी राहों में उम्र भर,
और मैं आज भी लिए फिरता हूँ नाम उसका सारा।
मिलना मुकद्दर में न था शायद,
फिर भी दिल ने उसे ही चुना दोबारा।
उसके ही हो गए हम, जो न सका हमारा,
यही इश्क़ का सबसे ख़ूबसूरत और दर्दभरा इशारा।
-संजय श्रीवास्तव