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बेतुकी जिद

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहां है
        
                                                    
                            
वो सुहाने मंज़र?

जहां है
सभी लम्हे मखमल

मुझे
पहुंचा दो
वहां कोई...

नहीं
बताओ
ये किस्सागोई...

कि मेहनत करनी पड़ती है...

मंज़िल... एकटक, देखनी होती है...

तन्हाई, मिटाने,
भाई हों... संग में

वफाई
ढूंढने...

हम निकलें...
अगले मौसम में

चेहरा, धोखा था...
अब मकाम का झांसा सही

क्या पता सही छलांग पे...
मेहनत का फल... फंसा हो कहीं?

कई ठोकरों की
एक दो चिंगारियां हैं

अकेले, हारे हम...
और शब्दों की यारियां हैं

इक्का दुक्का
मांगें किए

तमाम डर
बांधे हुए

चले... जा रहा हूं

नाले... गा रहा हूं

प्रभु,
गौर
करो ज़रा

मेरे,
करो...

गुनाह... रफ़ा-दफ़ा


-राहुल



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