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रघुवीर सहाय की कविता- निर्धन जनता का शोषण है

काव्य डेस्क

Kavita
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                            निर्धन जनता का शोषण है
        
                                                    
                            
कहकर आप हँसे
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कहकर आप हँसे
सब के सब हैं भ्रष्टाचारी
कह कर आप हँसे
चारों ओर बड़ी लाचारी
कहकर आप हँसे

कितने आप सुरक्षित होंगे मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पाकर फिर से आप हँसे

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