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कमलेश राजहंस की कविता- तुम मुझे बुलाते हो

काव्य डेस्क

Kavita
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                            जानता हूं मैं सब कुछ 
        
                                                    
                            
क्या तेरी कहानी है 
नयन के कटोरे में 
सिर्फ खारा पानी है 
आसरा की थपकी दे, दर्द को सुलाते हो 
           तुम मुझे बुलाते हो।

बांध रहे गांती में 
पूष के तुषारों को 
कारवां को खतरा है 
रोक दो कहारों को 
यामिनी सुगंधा पर 
कैक्टस का पहरा है 
कौन सुनेगा तेरी 
राजा तेरा बहरा है 
छिल गये तेरे कांधे 
फिर भी मौन को साधे 
जुर्म और दहशत का, बोझ क्यों उठाते हो 
               तुम मुझे बुलाते हो।

रोशनी हुई घायल 
बढ़ रहा अंधेरा है 
चीड़ औ चिनारों पर 
चील का बसेरा है 
खून बह रहा किसका 
टूट रहे रिश्ते क्यों 
झोपड़ी जला तेरी 
हंस रहे फरिश्ते क्यों 
धर्म हो गया नंगा 
मैली हो गई गंगा 
फिर भी बन के शंकर क्यों, जहर निगल जाते हो 
                तुम मुझे बुलाते हो।

अब न बोलती मैना 
घरों के मुंडेरों पर 
बाज घात में बैठे 
डालियों पे पेड़ों पर 
अस्मिता दुपहरी की 
सूर्य हर रहा देखो 
चांद के उजाले को 
तम निगल रहा देखो 
मैं अतीत का पत्थर 
वर्तमान तेरा है 
रक्त की तलहटी में 
डूबता सबेरा है 
मुझको भूलने वालों, खुद को भूल जाते हो 
          तुम मुझे बुलाते हो।

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