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सोशल मीडिया: गिलोटिन होते सपने

रत्नेश मिश्र

Viral Kavya
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                                                  स्वप्न दुनियादार नहीं होते-
कल्पनाएं निर्मम नहीं हुआ करतीं,
अन्यथा सत्य की वेदी पर 
बलि नहीं चढ़ा करतीं।
अन्यथा कभी नहीं होता कि
सत्य दु:स्वप्न हो जाता।

एक उम्र पार करती
आकांक्षाओं के भग्नावशेष बनने तक,
कब धुंधला जाते हैं खुली आंखों के दिवास्वप्न
उजाले को खबर नहीं होती।
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तनकर खड़े दिखते अस्तित्व की
बेहद कमजोर बैसाखियां
नहीं बताती वह मोहक तस्वीर।

उधार की छत तले
विकलांग इच्छाएं पाले लोगों के
तड़कते जिस्म
पुलक नहीं पाते
कई-कई स्वप्न अधूरे छोड़ते प्रतिदिन,
थके हुए पैरों को मरुद्यान,
क्षितिज पर टंगा हुआ दिखता है।

उस दुनिया में
जहां संवेदनाएं ओढ़ने से ज्यादा
मतलब न रखती हों,
जहां समय नेपथ्य में
गिलोटिन छुपाए घूमता हो, और...
अंतराल क्रमशः स्वप्न को
अपराध में बदल देता है।

(कुछ वेदनाओं में अपनी पीड़ाओं का विलय करते हुए। दर्शक बनकर दूसरों की वेदनाओं को अनुभव करते हुए, पता नहीं चलता, वे  कब अपनी पीड़ाओं में बदल जाती हैं।1986-87)

श्यामाकांत दूबे की फेसबुक वाल से
6 वर्ष पहले
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