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चिंताजनक: 'बस मुनाफा कमाना सिखा रहे बड़े-बड़े बिजनेस स्कूल', हार्वर्ड प्रोफेसर ने क्या-क्या दावे किए?
Tue, 20 Oct 2026 06:14 AM IST
निर्मल कांत
क्रिस मार्किस, द न्यूयॉर्क टाइम्स, कैम्ब्रिज/बोस्टन।
क्रिस मार्किस, द न्यूयॉर्क टाइम्स, कैम्ब्रिज/बोस्टन।
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 20 Oct 2026 06:14 AM IST
बिजनेस स्कूलों में समाज की समस्याएं सुलझाने का इरादा लेकर आने वाले युवा बड़ी कंपनियों में मोटी सैलरी और आकर्षक नौकरियों की होड़ में उलझ जाते हैं। प्रोफेसर क्रिस मार्किस ने प्रबंधन शिक्षा की सोच और कंपनियों के मुनाफे को प्राथमिकता देने पर सवाल उठाए हैं। आखिर क्यों वह इन बिजनेस स्कूलों को बंद कर नए संस्थान बनाने की वकालत कर रहे हैं? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
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बिजनेस स्कूलों की क्या है असलियत?
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट/ग्राफिक
विस्तार
स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने का सपना देखने वाला डॉक्टर हो या स्वच्छ ऊर्जा को आम लोगों तक पहुंचाना चाहने वाला इंजीनियर, जब ये युवा बिजनेस स्कूल पहुंचते हैं, तो उनके इरादे बदलने लगते हैं। समाज की समस्याएं सुलझाने और लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने की चाह पीछे छूट जाती है। उसकी जगह बड़ी कंपनी में नौकरी, मोटा वेतन, आकर्षक इंटर्नशिप और कंसल्टिंग या फाइनेंस की दुनिया में जगह बनाने की होड़ ले लेती है।
हार्वर्ड, कॉर्नेल और कैम्ब्रिज जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में दो दशक से अधिक समय तक पढ़ा चुके प्रोफेसर क्रिस मार्किस के मुताबिक, यह महज कुछ छात्रों की प्राथमिकताओं का बदलाव नहीं, बल्कि प्रबंधन शिक्षा की बुनियादी सोच का नतीजा है। मार्किस का आरोप है कि भारी फीस लेकर चलने वाले बिजनेस स्कूल छात्रों को ऐसे कारोबारी ढांचे का हिस्सा बनाते हैं, जिसमें सामाजिक हितों से ज्यादा कंपनियों के मुनाफे और शेयरधारकों के फायदे को तवज्जो मिलती है।
उनका तर्क इतना तीखा है कि वे इन संस्थानों में मामूली सुधार के बजाय इन्हें बंद कर उनकी जगह संगठन संचालन के नए संस्थान बनाने की वकालत करते हैं। अपनी किताब द प्रॉफिटीयर्स: हाउ बिजनेस प्राइवेटाइज प्रॉफिट एंड सोशलाइज कॉस्ट में भी वह निजी मुनाफे और उसकी सामाजिक कीमत के बीच के रिश्ते पर सवाल उठाते हैं। प्रोफेसर क्रिस की राय-भारी फीस वाले इन बिजनेस स्कूलों को अब बंद कर देना चाहिए।
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कुशल प्रबंधन या कर्मियों की कीमत पर मुनाफा?
मार्किस अपने तर्क के समर्थन में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डारोन एसेमोग्लू के एक अध्ययन का हवाला देते हैं। उनके अनुसार, अमेरिका और डेनमार्क के आंकड़ों में एमबीए डिग्रीधारी प्रबंधकों की नियुक्ति के बाद कुछ कंपनियों में कर्मचारियों के वेतन और कुल आय में श्रम की हिस्सेदारी घटने के संकेत मिले। इसके बावजूद उत्पादकता, बिक्री या रोजगार में वैसी बढ़ोतरी नहीं दिखी। मार्किस के मुताबिक, यह सवाल उठाता है कि प्रबंधन की कथित दक्षता का फायदा किसे मिलता है-काम करने वाले कर्मचारियों को या कंपनी के शीर्ष अधिकारियों व शेयरधारकों को?
ये भी पढ़ें: यूएन में अमेरिका-क्यूबा आमने-सामने: मतदान से पहले समर्थन जुटाने की कोशिश; ट्रंप प्रशासन की क्या है रणनीति?
केस स्टडी : कारोबारी चमक, खामियों पर पर्दा?
बिजनेस स्कूलों की पढ़ाई में कंपनियों के फैसलों और कारोबारी रणनीतियों को समझाने वाली केस स्टडी अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन मार्किस का आरोप है कि इन अध्ययनों में कंपनियों की छवि चमकाने वाली बातें ज्यादा और उनके कारोबारी मॉडल की बुनियादी खामियों पर सवाल कम हो सकते हैं। वह एनरॉन का उदाहरण देते हैं। घोटाले का खुलासा होने से पहले हार्वर्ड की कई केस स्टडीज में कंपनी के कारोबारी मॉडल की प्रशंसा की गई थी।
सामाजिक जिम्मेदारी के दावों पर भी सवाल
मार्किस के अनुसार, कंपनियां पर्यावरण संरक्षण और कर्मचारियों के हितों की बात तो करती हैं, लेकिन ऐसे वादे हमेशा उनके व्यवहार में बदलाव नहीं लाते। यही बाजार-केंद्रित सोच विश्वविद्यालयों में भी दिखाई देती है, जहां छात्रों को ग्राहक और डिग्री को उत्पाद की तरह देखा जाने लगा है। उनका मानना है कि इससे इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान जैसे विषयों का महत्व घटता है।
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हार्वर्ड, कॉर्नेल और कैम्ब्रिज जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में दो दशक से अधिक समय तक पढ़ा चुके प्रोफेसर क्रिस मार्किस के मुताबिक, यह महज कुछ छात्रों की प्राथमिकताओं का बदलाव नहीं, बल्कि प्रबंधन शिक्षा की बुनियादी सोच का नतीजा है। मार्किस का आरोप है कि भारी फीस लेकर चलने वाले बिजनेस स्कूल छात्रों को ऐसे कारोबारी ढांचे का हिस्सा बनाते हैं, जिसमें सामाजिक हितों से ज्यादा कंपनियों के मुनाफे और शेयरधारकों के फायदे को तवज्जो मिलती है।
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उनका तर्क इतना तीखा है कि वे इन संस्थानों में मामूली सुधार के बजाय इन्हें बंद कर उनकी जगह संगठन संचालन के नए संस्थान बनाने की वकालत करते हैं। अपनी किताब द प्रॉफिटीयर्स: हाउ बिजनेस प्राइवेटाइज प्रॉफिट एंड सोशलाइज कॉस्ट में भी वह निजी मुनाफे और उसकी सामाजिक कीमत के बीच के रिश्ते पर सवाल उठाते हैं। प्रोफेसर क्रिस की राय-भारी फीस वाले इन बिजनेस स्कूलों को अब बंद कर देना चाहिए।
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कुशल प्रबंधन या कर्मियों की कीमत पर मुनाफा?
मार्किस अपने तर्क के समर्थन में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डारोन एसेमोग्लू के एक अध्ययन का हवाला देते हैं। उनके अनुसार, अमेरिका और डेनमार्क के आंकड़ों में एमबीए डिग्रीधारी प्रबंधकों की नियुक्ति के बाद कुछ कंपनियों में कर्मचारियों के वेतन और कुल आय में श्रम की हिस्सेदारी घटने के संकेत मिले। इसके बावजूद उत्पादकता, बिक्री या रोजगार में वैसी बढ़ोतरी नहीं दिखी। मार्किस के मुताबिक, यह सवाल उठाता है कि प्रबंधन की कथित दक्षता का फायदा किसे मिलता है-काम करने वाले कर्मचारियों को या कंपनी के शीर्ष अधिकारियों व शेयरधारकों को?
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केस स्टडी : कारोबारी चमक, खामियों पर पर्दा?
बिजनेस स्कूलों की पढ़ाई में कंपनियों के फैसलों और कारोबारी रणनीतियों को समझाने वाली केस स्टडी अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन मार्किस का आरोप है कि इन अध्ययनों में कंपनियों की छवि चमकाने वाली बातें ज्यादा और उनके कारोबारी मॉडल की बुनियादी खामियों पर सवाल कम हो सकते हैं। वह एनरॉन का उदाहरण देते हैं। घोटाले का खुलासा होने से पहले हार्वर्ड की कई केस स्टडीज में कंपनी के कारोबारी मॉडल की प्रशंसा की गई थी।
सामाजिक जिम्मेदारी के दावों पर भी सवाल
मार्किस के अनुसार, कंपनियां पर्यावरण संरक्षण और कर्मचारियों के हितों की बात तो करती हैं, लेकिन ऐसे वादे हमेशा उनके व्यवहार में बदलाव नहीं लाते। यही बाजार-केंद्रित सोच विश्वविद्यालयों में भी दिखाई देती है, जहां छात्रों को ग्राहक और डिग्री को उत्पाद की तरह देखा जाने लगा है। उनका मानना है कि इससे इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान जैसे विषयों का महत्व घटता है।