इतिहास के पन्नों से: रियासतों से जिलों तक का सफर, कैसे बनी हमीरपुर-ऊना-सोलन की पहचान? जानिए 1972 की पूरी कहानी
1 सितंबर 1972 हिमाचल प्रदेश के इतिहास में अहम दिन है। इसी दिन प्रशासनिक पुनर्गठन के तहत हमीरपुर और ऊना को कांगड़ा से अलग कर नए जिले बनाए गए, जबकि सोलन का गठन महासू और शिमला जिलों के क्षेत्रों को मिलाकर हुआ। आज तीनों जिले अपनी अलग ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान के साथ प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। जानें विस्तार से...
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश के इतिहास में 1 सितंबर 1972 सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन था, जब प्रशासनिक जरूरतों के हिसाब से प्रदेश के नक्शे में बड़ा बदलाव हुआ और हमीरपुर, ऊना और सोलन तीन नए जिले के रूप में अस्तित्व में आए। तीनों जिलों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग-अलग रही, लेकिन इनके आधुनिक प्रशासनिक इतिहास की सबसे अहम कड़ी एक ही है—1 सितंबर 1972 का जिला पुनर्गठन।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने अपने गृह जिला हमीरपुर सहित ऊना और सोलन के स्थापना दिवस पर प्रदेशवासियों को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि हिमाचल की विकास यात्रा में सभी जिलों का विशेष योगदान रहा है और हमीरपुर, ऊना तथा सोलन अपनी गौरवशाली परंपराओं, संस्कृति और उपलब्धियों के साथ प्रदेश की प्रगति में निरंतर सहभागी रहे हैं।
मेरे गृह ज़िला हमीरपुर सहित ऊना एवं सोलन के स्थापना दिवस पर समस्त सम्मानित जनों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
— Sukhvinder Singh Sukhu (@SukhuSukhvinder) September 1, 2026
हिमाचल प्रदेश की विकास यात्रा में हमारे सभी ज़िलों का विशेष योगदान है। हमीरपुर, ऊना और सोलन भी अपनी गौरवशाली परंपराओं, संस्कृति और उपलब्धियों के साथ प्रदेश की प्रगति… pic.twitter.com/hTa5RxMivO
हिमाचल प्रदेश के गठन के बाद राज्य में प्रशासनिक सीमाओं में कई बदलाव हुए। अलग-अलग क्षेत्रों को संभालने के लिए जिलों और तहसीलों की सीमाओं का पुनर्गठन किया जाता रहा। 1 सितंबर 1972 को एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव हुआ। तत्कालीन कांगड़ा जिले का पुनर्गठन कर उससे हमीरपुर और ऊना को अलग जिले बनाया गया। वहीं, महासू और शिमला के कुछ हिस्सों के पुनर्गठन से सोलन जिला अस्तित्व में आया। इस बदलाव का उद्देश्य प्रशासन को लोगों के करीब लाना और बड़े भौगोलिक क्षेत्रों का बेहतर प्रबंधन करना था। इसी पुनर्गठन के बाद हिमाचल की जिला व्यवस्था मौजूदा स्वरूप की ओर बढ़ी और प्रदेश में कुल 12 जिले बने। यही वजह है कि हर साल 1 सितंबर को हमीरपुर, ऊना और सोलन का स्थापना दिवस मनाया जाता है।
हमीरपुर का इतिहास नया नहीं है। जिला भले ही प्रशासनिक तौर पर 1972 में बना, लेकिन इस क्षेत्र की ऐतिहासिक जड़ें सदियों पुरानी हैं। हमीरपुर क्षेत्र का इतिहास कांगड़ा की ऐतिहासिक विरासत और कटोच राजवंश से गहराई से जुड़ा रहा है। लंबे समय तक यह क्षेत्र कांगड़ा प्रशासन का हिस्सा था। ब्रिटिश दौर में भी प्रशासनिक सीमाओं में कई बदलाव हुए। 1 नवंबर 1966 को पंजाब के पुनर्गठन के बाद हमीरपुर क्षेत्र हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बना। इसके करीब छह साल बाद 1 सितंबर 1972 को कांगड़ा जिले का पुनर्गठन हुआ और हमीरपुर स्वतंत्र जिला बन गया। शुरुआत में यहां हमीरपुर और बड़सर दो तहसीलें थीं। बाद के वर्षों में जिले का प्रशासनिक विस्तार हुआ और सुजानपुर, नादौन, भोरंज आदि क्षेत्रों को अलग तहसीलों का स्वरूप मिला।
हमीरपुर को अक्सर 'वीरभूमि' कहा जाता है। भारतीय सेना में जिले के लोगों की बड़ी भागीदारी रही है। इसके अलावा सुजानपुर टीहरा, नादौन और बाबा बालक नाथ से जुड़े धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल इसकी पहचान हैं। हमीरपुर की एक और खास बात यह है कि यह मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू का गृह जिला है।
ऊना की कहानी प्रशासनिक सीमाओं के बदलाव की एक दिलचस्प मिसाल है। आज हिमाचल का हिस्सा ऊना क्षेत्र 1966 से पहले पंजाब के होशियारपुर जिले की एक तहसील था। पंजाब पुनर्गठन के बाद 1 नवंबर 1966 को ऊना हिमाचल प्रदेश में शामिल हुआ और इसे कांगड़ा जिले के साथ जोड़ा गया। इसके बाद 1 सितंबर 1972 को कांगड़ा जिले के पुनर्गठन के दौरान ऊना को अलग जिला बना दिया गया। लेकिन ऊना का इतिहास इससे कहीं पुराना है। वर्तमान जिले के कई हिस्सों का संबंध जसवां, सिबा और कुटलैहर जैसी ऐतिहासिक रियासतों से रहा है। कांगड़ा के कटोच राजवंश का भी इस क्षेत्र के इतिहास पर प्रभाव रहा।
ऊना की पहचान सिर्फ प्रशासनिक या औद्योगिक विकास से नहीं है। यह हिमाचल के प्रमुख धार्मिक क्षेत्रों में भी गिना जाता है। यहां माता चिंतपूर्णी मंदिर देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इसके अलावा डेरा बाबा बड़भाग सिंह, शिवबाड़ी और अन्य धार्मिक स्थल जिले की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
औद्योगिक पहचान भी बनी
समय के साथ ऊना ने औद्योगिक क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई। मेहतपुर, गगरेट, टाहलीवाल और अंब जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ीं। रेल संपर्क ने भी जिले के विकास को गति दी। ऊना को रेल नेटवर्क से जोड़ना जिले के आधुनिक विकास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल रहा है।
सोलन की कहानी हमीरपुर और ऊना से थोड़ी अलग है। इसका गठन कांगड़ा के पुनर्गठन से नहीं, बल्कि महासू और शिमला जिलों के पुनर्गठन से हुआ। 1 सितंबर 1972 को नए सोलन जिले में तत्कालीन महासू जिले की सोलन और अर्की तहसीलें तथा तत्कालीन शिमला जिले की कंडाघाट और नालागढ़ तहसीलें शामिल की गईं। इस तरह अलग-अलग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले क्षेत्र मिलकर एक नया जिला बने।
वर्तमान सोलन जिले के क्षेत्र में कभी कई छोटी-बड़ी पहाड़ी रियासतें थीं। बघाट, अर्की, कुनिहार और नालागढ़ जैसी रियासतों ने इस क्षेत्र के इतिहास को आकार दिया। 18वीं-19वीं शताब्दी में गोरखा शक्ति के विस्तार का प्रभाव भी इस क्षेत्र पर पड़ा। बाद में अंग्रेजों ने गोरखाओं को पराजित किया और क्षेत्र की कई रियासतों को फिर से उनके पुराने शासकों के अधीन कर दिया गया।
सोलन शहर की पहचान मां शूलिनी से गहराई से जुड़ी है। मां शूलिनी को क्षेत्र की आराध्य देवी माना जाता है और उनके नाम पर हर वर्ष प्रसिद्ध शूलिनी मेला आयोजित होता है। यही धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत सोलन की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
'मशरूम सिटी' और 'रेड गोल्ड' के नाम से भी प्रसिद्ध है सोलन
आधुनिक समय में सोलन ने कृषि और बागवानी के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। सोलन को 'मशरूम सिटी ऑफ इंडिया' कहा जाता है। यहां मशरूम उत्पादन और अनुसंधान ने इसे देशभर में पहचान दिलाई। टमाटर उत्पादन के कारण भी सोलन को 'रेड गोल्ड' से जोड़ा जाता है। जिले में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के साथ-साथ उद्योगों का भी तेजी से विस्तार हुआ है। इसके अलावा कालका-शिमला रेलवे सोलन की ऐतिहासिक और पर्यटन पहचान का अहम हिस्सा है। यह विश्व धरोहर रेलवे मार्ग का हिस्सा है।
हमीरपुर, ऊना और सोलन के इतिहास को अगर एक साथ देखें तो तीनों की कहानी में एक दिलचस्प समानता दिखाई देती है। इनकी आधुनिक जिला पहचान 1 सितंबर 1972 से शुरू हुई। लेकिन उससे पहले तीनों क्षेत्रों का इतिहास अलग-अलग राजवंशों, रियासतों और प्रशासनिक इकाइयों से जुड़ा रहा।
हमीरपुर का इतिहास कांगड़ा और कटोच परंपरा से जुड़ा रहा।
ऊना का इतिहास पंजाब के होशियारपुर, कांगड़ा और जसवां-कुटलैहर जैसी ऐतिहासिक रियासतों से जुड़ा रहा। सोलन का इतिहास महासू-शिमला क्षेत्र और बघाट, अर्की, कुनिहार, नालागढ़ जैसी रियासतों से जुड़ा रहा। इस तरह 1 सितंबर 1972 ने इन क्षेत्रों की सदियों पुरानी ऐतिहासिक पहचान को एक नई प्रशासनिक पहचान दी।
| जिला | स्थापना दिवस | 1972 में गठन कैसे हुआ | आज की प्रमुख पहचान |
|---|---|---|---|
| हमीरपुर | 1 सितंबर 1972 | कांगड़ा जिले के पुनर्गठन के बाद अलग जिला बना | वीरभूमि, सुजानपुर, नादौन, सैन्य सेवाओं में भागीदारी |
| ऊना | 1 सितंबर 1972 | कांगड़ा जिले के पुनर्गठन के बाद अलग जिला बना | माता चिंतपूर्णी, धार्मिक पर्यटन, उद्योग और रेल कनेक्टिविटी |
| सोलन | 1 सितंबर 1972 | महासू और शिमला जिलों के पुनर्गठन के बाद बना | मां शूलिनी, ऐतिहासिक रियासतें, मशरूम उत्पादन और उद्योग |
स्थापना दिवस सिर्फ जिले के गठन की तारीख याद करने का अवसर नहीं है। यह उस सफर को याद करने का दिन भी है, जिसमें इन क्षेत्रों ने प्रशासनिक बदलावों से लेकर आधुनिक विकास तक लंबा रास्ता तय किया है।
हमीरपुर ने शिक्षा, सेना और सामाजिक क्षेत्र में पहचान बनाई। ऊना ने धार्मिक पर्यटन के साथ उद्योग और रेल संपर्क में विस्तार किया। सोलन ने पर्यटन, कृषि, मशरूम उत्पादन और औद्योगिक विकास में अपनी अलग पहचान कायम की। इसी गौरवशाली यात्रा को याद करते हुए मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने तीनों जिलों के स्थापना दिवस पर लोगों को शुभकामनाएं दी हैं और उनके सुख, शांति एवं खुशहाली की कामना की है। यानी 1 सितंबर की तारीख तीन जिलों के लिए सिर्फ स्थापना दिवस नहीं, बल्कि पुराने इतिहास से आधुनिक हिमाचल तक पहुंचने की पूरी यात्रा को याद करने का दिन है।