हिमाचल प्रदेश: पुराने और मोटे चीड़ के पेड़ बने गिद्धों के पसंदीदा आशियाने, 553 पेड़ों पर मिले 617 घोंसले
हिमाचल के पुराने चीड़ के जंगल संकटग्रस्त गिद्धों के लिए जीवनदायी साबित हो रहे हैं। कांगड़ा में चार साल के अध्ययन में 553 पेड़ों पर 617 सक्रिय घोंसले मिले, जबकि करीब 80 फीसदी घोंसले 600 से 800 मीटर की ऊंचाई पर पाए गए। शोध ने साफ किया है कि बड़े और पुराने चीड़ के पेड़ों का संरक्षण गिद्धों की आबादी बचाने के लिए बेहद जरूरी है।
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हिमाचल प्रदेश के जंगलों में बड़े और पुराने चीड़ के पेड़ गिद्धों के प्रमुख आशियाने बने हुए हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून से संबद्ध रहे मल्याश्री भट्टाचार्य और गौतम तालुकदार के शोध में सामने आया है कि संकटग्रस्त सफेद पीठ वाले गिद्ध घोंसला बनाने के लिए खासतौर पर पुराने और मोटे चीड़ के पेड़ों को पसंद करते हैं। कांगड़ा में वर्ष 2020 से 2024 के बीच किए गए अध्ययन में 17 गिद्ध बस्तियों में 617 सक्रिय घोंसले मिले। ये घोंसले 553 पेड़ों पर बनाए गए। शोधपत्र हिमाचल प्रदेश में सफेद पीठ वाले गिद्ध के घोंसला स्थल का चयन और घोंसले वाली बस्तियों पर खतरे में यह जानकारी सामने आई है। यह शोधपत्र फॉरेस्ट इकॉलॉजी एंड मैनेजमेंट में छापा गया है।
अध्ययन में पाया गया कि घोंसला बनाने वाले पेड़ों का औसत तना और घेरा करीब 255 सेंटीमीटर था। पेड़ की मोटाई, शाखाओं और पत्तियों का फैलाव और आसपास मौजूद दूसरे घोंसलों से दूरी गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण कारक रहे। करीब 80 फीसदी घोंसले समुद्र तल से 600 से 800 मीटर की ऊंचाई के बीच मिले। शिमला ग्रामीण वन मंडल में हिमालयी गिद्धों की प्रजनन संख्या को लेकर अर्चि सहगल, रोहित चौधरी और शिवानी देवी ने अध्ययन किया है। ये तीनों शूलिनी विवि सोलन से हैं, जबकि इनके अध्ययन में सहयोग बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बांदा के रोहित चौधरी ने किया है।
जंगल की आग से खतरा
अध्ययन में जंगल की आग, चीड़ के पेड़ों से बिरोजा निकालने और पेड़ों की कटाई को गिद्धों के घोंसलों के लिए प्रमुख खतरा बताया गया है। शोधकर्ताओं ने बड़े और पुराने पेड़ों वाले जंगलों को बचाने, स्थानीय लोगों और वन विभाग के बीच जागरूकता बढ़ाने की सिफारिश की है। जंगल की आग से बचाव के विशेष उपाय करने की जरूरत भी बताई गई है।
गिद्ध संरक्षण को लेकर 31 अगस्त से 6 सितंबर तक अभियान चलेगा। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के उपलक्ष्य में यह पहल जेडएसएल एज और द हैबिटैट्स ट्रस्ट ने वन एवं वन्यजीव विभाग के सहयोग से शुरू की है। कांगड़ा के लपियाणा, घीणा और धर्मशाला के 15 स्कूलों में जागरूकता व शैक्षणिक गतिविधियां होंगी। विद्यार्थी गिद्धों पर पेंटिंग और छोटे वीडियो बनाकर अपनी यादें और अनुभव साझा कर सकेंगे। मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव सरोज भाई पटेल और मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव शिमला प्रीति भंडारी ने पहल का स्वागत किया।