घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल!
याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल!
कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिए न समाज?
कौन है वह एक जिसको नहीं पड़ता दूसरे से काज?
चाहिए किसको नहीं सहयोग?
चाहिए किसको नहीं सहवास?
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'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अर्चा, जिसका अर्थ है- पूजा, प्रतिमा। प्रस्तुत है जानकीवल्लभ शास्त्री की कविता- यह पीर पुरानी हो !
यह पीर पुरानी हो !
मत रहो हाय, मैं, जग में मेरी एक कहानी हो।
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कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के
मैं ख़यालों में भटकती रही जोगन बन के
हर जनम में मुझे यादों के खिलौने दे के
वो बिछड़ता रहा मुझ से मिरा बचपन बन के
मेरे अंदर कोई तकता रहा रस्ता उस का
मैं हमेशा के लिए...और पढ़ें
सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे
वैसे तो हम वही हैं जो पहले थे दोस्तो
हालात जैसे पहले थे वैसे नहीं रहे
ख़ुद मर गया था जिन को बचाने में पहले बाप
अब के फ़साद में वही...और पढ़ें
ज़ख्म वह अब तलक नासाज़ है।
किंतु रोता नहीं, जांबाज़ है।
यार! तुम और मत खोदो उसे;
वहाँ नासूर का अब राज है।
दिये हैं ज़ख्म काफ़ी बज़्म ने,
किंतु तेरा दिया सरताज़ है।
भुलाया है बहुत कुछ अब तलक...और पढ़ें
तुम्हारी जुल्फों की तारीफ करते करते मेरे अल्फ़ाज़ कम पर गये,
जब मैं ने तुम्हें साड़ी देखा तो मेरे होशो हवास उड़ गए...और पढ़ें
घमंड में इंसान
ख़ुद को सबसे,
जुदा समझने लगता है।
जो ज़मीं पर खिलने के
क़ाबिल नहीं होते,
वो भी ख़ुद को,
ख़ुदा समझने लगते हैं।।
-ममता तिवारी...और पढ़ें
किसी को ध्यान ही आया न रुत बदलने का
था इंतिज़ार हर इक को हवा के चलने का
वही पुराने मुसाफ़िर मिले नई रह पर
था इफ़्तिख़ार हमें जिन से बच निकलने का
अब एक दूसरे को मुड़ के देखते भी नहीं
कभी था ज़ो'म...और पढ़ें
कौन कहता है जिंदगी एक बार मिलती है,तेरे बहाने वो मुझे हर रोज मिलती है,
कौन कहता है मौत एक बार मिलती है, तेरे बहाने वो मुझे हर रोज मिलती है...और पढ़ें
करता हूं मैं स्वदेश से प्यार
करता हूं मैं स्वभेष से प्यार
करता हूं मैं अपनी संस्कृति से प्यार
करता हूं मैं अपने संस्कार से प्यार
करता हूं मैं अपने इतिहास से प्यार
करता हूं मैं अपने साहित्य से प्यार
है हमारी स...और पढ़ें
मैं ने अपनी मर्जी नहीं बदला है अपने आप को,
तुम ने मजबूर कर दिया मुझे बदलने पर...और पढ़ें
हर इक बात के मायने नहीं होते
सतह पर रहा करतीं हैं कुछ बातें
चोट करती हैं कुछ गहरा बहुत
उतर जाती हैं दिल में कुछ बातें .
-दिनेश चौहान...और पढ़ें
है ईमानदार, इसीलिए तन्हा है अकेला है
कितना सीधा भोला है
इसकी ईमानदारी का निकला यही बोल
सीधा तो है ही, है बड़ा बकलोल
जितने मिले सब गुरु, मिला ना कोई चेला
सबसे उपदेश के सिवा उसे कुछ नही मिला
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मंजुल मंजुल देखि परै सिगरी वसुधा तन पै हरियाली।
धानन का रँग पीत हुआ जनु स्वर्ण छटा छिटकी मतवाली।
है सरदी गरमी गबड़ी नभ में दिन रात दिखै उजियाली।
मारग सूखि गए सब ही मिटि गै बरिखा कचड़ा बदहाली।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्ने...और पढ़ें
करवा चौथ का दिन है आया,
सोलह श्रृंगार करने का सम्मान मैने पाया,
माँग में सिंदूर सजा कर,
हाथों में मेहंदी लगा कर,
बालों में गजरे सजा कर,
न भूख लगी है, न प्यास,
सिर्फ तुम्हारे लम्बी उम्र की ,
मन में कामन...और पढ़ें
वो मेहनत ही क्या, जिसमें कठिनाइयाँ न हों,
वो मंज़िल ही क्या, जिसमें संघर्ष न हो,
वो दिन ही क्या, जिसमें प्रकाश न हो,
वो मित्र ही क्या, जिस पर विश्वास न हो,
वो प्रकृति ही क्या, जिसमें हरियाली न हो,
वह विद्यालय ही क्य...और पढ़ें
जब आम बहुत बौराए थे, भौंरों ने कुछ गीत सुनाए,
महकी-महकी बगिया में फिर, मौसम ने संदेश सुनाए।
डाली-डाली झूम उठी थी, पत्तों ने सुर ताल मिलाए,
धरती ने चादर ओढ़ी थी, अम्बर ने सपने बरसाए।
कोयल ने जब तान छेड़ी, पुरवाई भी...और पढ़ें
तू सच्चे प्रेम की भाषा है ,
तू मेरे जीवन की आशा है
तेरे प्रेम के बारे मे ,गुणगान करने को शब्द नहीं
तेरे प्रेम के बिना, जीवन का कोई अस्तित्व नहीं
सच्चे प्रेम की भाषा, मैने तुमसे ही सीखी है
जीने की अभिलाषा, मैने तुमसे...और पढ़ें
सच्चा प्रेम नहीं है केवल, रूप-रंग का आकर्षण,
यह तो दो आत्माओं का, एक पवित्र समर्पण।
इसमें न कोई दिखावा है, न कोई झूठा वादा है,
यह तो गंगा जल जैसा, बिलकुल पावन और सादा है।
जहाँ न कोई शर्त छुपी हो, ना ही कोई बंधन हो,
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मैं चाह कर जरा भी संगदिल नहीं होता
फूलों की ओर देखूं मुनासिब नहीं होता
कितने दिनों से दिल भी मेरा मुझसे खफा है
कुल दिन हुए ये मुझसे मुताखिब नहीं होता
गर्दिश जमाने भर की हँसा करती है मुझपर
कुछ जिंदगी में मेरे मुताबिक...और पढ़ें