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उसके जीवन की मृत्यु में कर दिया।

                
                                                         
                            कुछ समय पहले ही बाहर
                                                                 
                            
बारिश थमी थी।

आँगन के पानी में
आकाश के चेहरे का प्रतिबिंब
छिटक-छिटककर गिर रहा था,
और उसी पानी के गड्ढे में
एक स्त्री खोज रही थी—
अपना चेहरा।

सुबह
उसके माथे का रंग
एक सूख चुकी नदी की तरह
निःशब्द उससे दूर चला गया।

उसने खो दी थी
नदी बनकर बह सकने की संभावना।

उसके बाद
ऋतुएँ उसका पता
भूलने लगीं।

वसंत आया—
गाँव के बाँसवन की पत्तियों में,
कृष्णचूड़ा की अग्निमय शाखाओं में,
एक किशोरी के बालों में
बेफिक्री से बँधी
एक रंगीन रिबन में,
लेकिन उसके द्वार पर
वसंत ने जूते उतारकर
खड़े रहना ही चुना।

उसे कहा गया था—

कुछ रंग तुम्हारे नहीं हैं।
कुछ हँसियाँ तुम्हारी नहीं हैं।
कुछ रास्ते तुम्हारे नहीं हैं।

समाज ने उसके चारों ओर
एक नदी खींच दी—
पानी से नहीं,
निषेधों से।

नदी के उस पार थे—
उत्सव,
बाज़ार,
विवाह के गीत,
बच्चों का कोलाहल,
एक स्त्री की साधारण-सी आकांक्षा।

इस पार
एक लंबी छाया।

वह नदी पार करना नहीं चाहती थी;
वह केवल सोचती थी—
यह नदी किसने खींची?

खेत की मिट्टी
इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानती थी।

धान के पौधे
हवा में झुक रहे थे,
जैसे पृथ्वी का कोई विधान
उनके सिर पर लिखा ही न हो।

एक केंचुआ
मिट्टी के अँधेरे को चीरकर
बाहर आया था।

वह समझ गई थी—

जीवन कभी भी
शोक के नियमों का पालन करके
जन्म नहीं लेता।

लेकिन मनुष्य करता है।

मनुष्य
मृत पुरुष की स्मृति के लिए
जीवित स्त्री के शरीर में
शोक का एक राज्य स्थापित कर देता है।

उसकी थाली में
सबसे पहले कम हुआ नमक,
फिर इच्छा।

विरासत के काग़ज़ पर
उसका नाम था,
लेकिन उस नाम के पास
रिश्तेदारी की अनेक उँगलियों ने
अदृश्य स्याही से
अपने अधिकार लिख छोड़े थे।

वह उस स्याही को
पढ़ नहीं सकी।

क्योंकि वह भाषा
क़ानून की नहीं थी—
परंपरा की थी।

रात में
सबके सो जाने के बाद
वह अपने सीने के भीतर
एक सूखी नदी की आवाज़ सुनती थी।

वह नदी कहाँ से आई थी,
वह नहीं जानती थी।

शायद
उसके अपने भीतर से...

बहुत दिनों से
उसके भीतर बारिश जमा होती रही थी।

किसी बादल ने
उसे बारिश नहीं कहा था।

किसी मनुष्य ने
उसे आकांक्षा नहीं कहा था।

किसी धर्मग्रंथ ने
उसके लिए कोई नाम निर्धारित नहीं किया था।

एक दिन बारिश आई।

आँगन में नहीं—
उसके भीतर।

इतने दिनों से
उसके भीतर एक अनजाना अँधेरा
चुपचाप जमा होता रहा था।

अब दिन का प्रकाश
शोक को अस्वीकार नहीं करता;
केवल शोक के अधिकार को
जीवन के अधिकार तक
फैलने नहीं देता।

मृत व्यक्ति
अपनी स्मृति में रहे—
लेकिन उसका भविष्य
क्यों कब्र में रहे?

उसके वस्त्रों पर
लोगों की आँखें कठोर हो जाती हैं;
वह अकेली निकलती है तो
रास्तों पर जन्म लेती है
एक अनकही नैतिकता।

एक मृत पुरुष की स्मृति को
बचाए रखने के लिए
एक जीवित स्त्री को
अपने जीवन का कितना हिस्सा
अर्पित करना पड़ता है—

इस प्रश्न की जड़
कोई नहीं समझता।

शताब्दियों ने तय कर दिया है—
पुरुष की अनुपस्थिति
स्त्री के अस्तित्व की
अंतिम परिभाषा है।

जिन हाथों ने
उसके सिर को छूकर
उसे सांत्वना दी थी,
उन्हीं हाथों ने
अगले दिन
उसके जीवन से
रंग छीन लिए।

किसी पुरोहित के
किसी मंत्र में नहीं थीं
उसकी अकेली रातें...

किसी धर्मग्रंथ के पन्नों पर नहीं था
एक स्त्री का
फिर से हँस पाने का अधिकार...

समाज ने
उसके पति की मृत्यु का
अनुवाद
उसके जीवन की मृत्यु में कर दिया।

और वह—
एक जीवित घर,
जिसकी सारी खिड़कियाँ
बाहर के लोगों ने
बाहर से बंद कर दी थीं।

उसके घर में
गुच्छों-गुच्छों उग आई है
हरी काई।

वह खिड़की की दरार से
कई दिनों से देखती आई है—
नदी के किनारे के श्मशान में
झंडे की तरह उड़ता हुआ
वह चादर,
जो उसकी माँ ने बुनी थी।
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6 घंटे पहले

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