निःशब्द-नभ में प्रणव-नाद की, चिदनुगूँज अनवरत गाती।
ऋत-दीप्ति बन अंतराकाश में, शिव-प्रज्ञा निज दीप जलाती॥
अविद्या-ग्रंथि स्वयं विलय हो, जागे तत्त्वमसि का बोध।
अहं-विषाद भस्मीभूत हो, फूटे चिदानन्द-प्रमोद॥
जटा-जूट से ज्ञान-गङ्गा बहे, करुणामृत-अभिषेक करे।
नीलकण्ठ-सा धारण कर विष, विश्व-हृदय में सुधा भरे॥
नटराज-पद-लय में नाचे, प्रकटे चिद्ब्रह्म का तत्त्व।
जीव न रहे, केवल ब्रह्मस्वर—यही सनातन परम शिवत्व॥
- सनातन मुकुंद
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