डाकिया अब भी आता है,
बस चिट्ठियाँ नहीं लाता,
दरवाज़े पर दस्तक देता है,
और ख़ाली हाथ लौट जाता है।
कभी इन्हीं गलियों में
काग़ज़ पर रिश्ते चलते थे,
कुछ शब्द पिता के होते थे,
कुछ माँ के आँसू कहते थे।
एक चिट्ठी में पूरा घर था,
एक चिट्ठी में गाँव,
कहीं खेतों की मिट्टी थी,
कहीं बचपन की छाँव।
अब संदेश आते हैं—
“हाँ, मैं ठीक हूँ।”
दो शब्दों में सिमट गई
पूरे दिन की ख़बर।
न कोई स्याही सूखती है,
न कोई काग़ज़ महकता है,
न कोई चिट्ठी तकिए के नीचे
रखकर कोई सोता है।
कल पुराने संदूक में
एक काग़ज़ मिला मुझे,
स्याही धुंधली थी उसकी,
पर शब्द साफ़ थे।
लिखा था—
“जल्दी घर आ जाना,
बहुत दिन हो गए।”
मैं देर तक उस काग़ज़ को
हाथों में थामे रहा…
तब समझ आया—
कुछ चिट्ठियाँ डाक से नहीं,
वक़्त से देर से पहुँचती हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X