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तीन गीत

                
                                                         
                            नींद के अँधियारों में
                                                                 
                            
जब मैं पड़ा हुआ था,
रब की तकबीर की ध्वनियाँ
मुझे पुकार जगाती रहीं।
आँखें खुलीं तो देखा
मक्का का अद्भुत नज़ारा;
नयनों को शीतल करती
मदीना भी देखा मैंने...
(नींद के अँधियारों में...)

अज्ञान और आलस ने,
भोग की असीम तृष्णाओं ने
चारों ओर से जकड़ लिया था
मेरे सारे जीवन को।
अब निर्मल जल-सा पावन,
शुद्ध हवा-सा समृद्ध हुआ;
स्वर्गिक सुगंध को पीकर
उसका अर्थ समझ पाया,
मैंने अपनी रूह की
खुशबू को पहचान लिया।
(नींद के अँधियारों में...)

उजाले के भीतर भी,
अँधेरे के बीच भी,
हृदय और मस्तिष्क की गहराइयों में
प्रेम की शीतलता भर आई।
नित्य-विस्मय बन जाने वाली
विनम्रता के क्षण में
अहंकार का अँधेरा मिट गया...
आत्मा के सूरज की धूप में भी
चाँदनी को पहचान लिया...!
(नींद के अँधियारों में...)

2. माप्पिला-गीत
-------
ऐ मेरी प्यारी, फूल-सी दुलारी,
मेरे दिल की आनंद-झील की निर्मल मोती,
काजल से आँखें सजा,
माथे पर बिंदी लगा,
फिर भी पिंजरे में बंद
एक तड़पती तोता तू ही है...
(ऐ मेरी प्यारी...)

सारे सौंदर्य को एक साथ समेटे,
आकाश के बादल-पुष्प-सी,
धरती पर खिली हुई
गुलाब की पंखुड़ी तू;
लेकिन, हाय,
सब कुछ सहना ही
तेरी नियति बनी है!
(ऐ मेरी प्यारी...)

रचयिता के दिल की करुणा
और अहद के खुले हृदय से निकली
राग की मधुर धारा,
जब दोनों एक सुर में मिले,
उस क्षण जन्मा
एक छायादार वृक्ष तू।

फिर भी, अँधेरे में जलता
एक दीपक है तू,
और स्वयं को भीतर-ही-भीतर जलाती
काली बत्ती भी तू ही है!
(ऐ मेरी प्यारी...)

3. मौन के लिए एक गीत
-------
विषाद की बेसुरी करुण पुकार
बनकर वीणा की टूटी हुई तार,
हर रात मैं जागता पड़ा रहता हूँ।
किसी एकांत झील के किनारे
हे मौन, मेरे सहोदर,
तू ही तो रहता है...!
(विषाद की बेसुरी...)

उषा-संध्या और तपती दोपहर में
प्यासे तिनके-सा,
आँधी के प्रचंड प्रहारों में भी
मैं टूटकर नहीं गिरता;
हे मूकता, सुन,
माँ की कोख से ही
साथ बनकर तूने
मुझमें जो ताप उतारा,
उसी की अग्नि से आज भी
मैं अडिग खड़ा हूँ!
(विषाद की बेसुरी...)

मेरे हृदय-आँगन में
एकाकी जलता हुआ सूरज है,
और धूप में पिघलती चाँदनी
मेरी चेतना है।
कहीं दूर बिछुड़ गए
मेरे उस साथी, हे मौन,
तेरी खोई हुई स्मृतियों में
मेरी बाँसुरी आज भी
अपना स्वर खोजती है...
(विषाद की बेसुरी...)
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36 मिनट पहले

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