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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Questions for the Election Commission: What danger did Dr. Ambedkar warn against 77 years ago

चुनाव आयोग पर सवाल: 77 साल पहले डॉ. आंबेडकर ने किस खतरे से किया था आगाह?

सार
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16 जून 1949 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण आशंका जताई थी। उनका सवाल था कि केवल चुनाव आयुक्त का कार्यकाल सुरक्षित कर देना पर्याप्त कैसे होगा, अगर नियुक्ति की व्यवस्था ऐसे व्यक्ति को रोक न सके जो कार्यपालिका के प्रभाव में हो? करीब 77 साल बाद 2026 में चुनाव आयोग फिर सवालों के केंद्र में है।

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Questions for the Election Commission: What danger did Dr. Ambedkar warn against 77 years ago
चुनाव आयोग में मतभेद? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

तारीख थी 16 जून 1949, संविधान सभा में चुनाव आयोग की संरचना, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उन्हें पद से हटाने के प्रावधानों पर बहस चल रही थी। इसी दौरान डॉ. बीआर आंबेडकर ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी एक ऐसी चिंता सामने रखी, जिसकी चर्चा आज 77 साल बाद फिर हो रही है।

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संविधान सभा की आधिकारिक कार्यवाही के मुताबिक डॉ. आंबेडकर ने माना था कि केवल चुनाव आयुक्त को निश्चित और सुरक्षित कार्यकाल देने का कोई खास मतलब नहीं होगा, यदि संविधान में ऐसी व्यवस्था न हो जो किसी अनुपयुक्त व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति रोक सके जो कार्यपालिका के प्रभाव में रहने वाला हो।
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इसके लिए उन्होंने बेहद स्पष्ट शब्दों में “under the thumb of the Executive” कहा था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि उनके प्रस्ताव में अनुपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति को रोकने की कोई व्यवस्था नहीं थी और नियुक्ति का यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण था।
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यह बात समझना जरूरी है कि आंबेडकर उस समय किसी सरकार या किसी चुनाव आयुक्त पर आरोप नहीं लगा रहे थे। उनकी चिंता भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर थी। सवाल यह था कि चुनाव कराने वाली संस्था को कार्यपालिका से स्वतंत्र रखने के लिए नियुक्ति की प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।

77 साल बाद क्यों याद आ रही है वह बहस?

2026 में चुनाव आयोग एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में है। खासकर मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर आयोग के फैसलों पर विपक्ष और विभिन्न पक्षों की ओर से सवाल उठाए गए हैं। लेकिन सितंबर में सामने आई एक रिपोर्ट ने इस बहस में नया पहलू जोड़ दिया।

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में आयोग के विभिन्न कदमों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

रिपोर्ट के अनुसार ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, SIR से संबंधित अपीलों तथा मतदाता सूची से जुड़े आईटी सिस्टम जैसे विषयों तक फैली थीं। कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर यह भी कहा कि निर्णय उनकी जानकारी के बिना लिए गए।

यहीं से सवाल गंभीर हो जाता है। तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में अगर दो आयुक्त किसी प्रक्रिया पर लिखित आपत्ति दर्ज कर रहे हैं, तो उस असहमति को कैसे देखा जाना चाहिए?

आयोग का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण

इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग का पक्ष नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आयोग से जुड़े सूत्रों ने मीडिया में आई मतभेद की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि SIR सहित आयोग के सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं। यानी औपचारिक आपत्तियां या प्रक्रिया के दौरान मतभेद होने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि आयोग के अंतिम निर्णय बहुमत या सहमति के बिना हुए।

इसलिए आंतरिक मतभेद की खबरों को सीधे इस निष्कर्ष से जोड़ देना कि चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं है, उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा।

लेकिन इन घटनाओं ने पारदर्शिता का सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। अगर संवैधानिक संस्था के सदस्यों के बीच महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को लेकर मतभेद हैं, तो क्या मतदाता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि किस फैसले पर किसने क्या आपत्ति की और उसका निपटारा कैसे हुआ?

2023 का कानून और नियुक्ति का सवाल

इसी बहस का दूसरा सिरा मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ फैसले में संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक एक अंतरिम व्यवस्था निर्धारित की थी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति को चुनाव आयुक्तों के चयन में भूमिका दी गई थी।

इसके बाद संसद ने 2023 में नया कानून बनाया। इस कानून में चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया। भारत के मुख्य न्यायाधीश इस समिति का हिस्सा नहीं हैं। इसी व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

और यही वह जगह है जहां 1949 की बहस फिर प्रासंगिक दिखाई देती है। तब आंबेडकर पूछ रहे थे कि नियुक्ति की ऐसी व्यवस्था कैसे बने जिससे कार्यपालिका के प्रभाव की आशंका कम की जा सके। आज सुप्रीम कोर्ट के सामने भी प्रश्न चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा स्वतंत्रता का सवाल

23 सितंबर 2026 को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ की अलग-अलग राय सामने आई। मामला अब मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा गया है ताकि उचित संख्या वाली पीठ के गठन पर फैसला किया जा सके।

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के साथ उसकी निष्पक्षता की सार्वजनिक धारणा का मुद्दा भी सामने आया है। जुलाई की सुनवाई में अदालत ने नियुक्ति प्रक्रिया के संदर्भ में “show of fairness” यानी निष्पक्षता दिखाई देने के पहलू पर सवाल किया था।

इससे बहस केवल यह नहीं रह जाती कि चुनाव आयोग कानूनी रूप से स्वतंत्र है या नहीं। लोकतंत्र में उतना ही महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि आम मतदाता उस संस्था को कितनी स्वतंत्र और निष्पक्ष मानता है।

सिर्फ कानून नहीं, भरोसे का भी सवाल

चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 से व्यापक अधिकार मिले हैं। लेकिन किसी भी चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी शायद उसकी संवैधानिक शक्तियों से भी आगे जाकर जनता का भरोसा होती है।

सत्ता पक्ष चुनाव जीत सकता है, विपक्ष चुनाव हार सकता है और अगले चुनाव में परिस्थितियां उलट भी सकती हैं। लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था पर दोनों पक्षों और मतदाताओं का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है।

इसीलिए चुनाव आयोग से जुड़ा कोई भी विवाद सामान्य प्रशासनिक विवाद से अलग हो जाता है। मतदाता सूची में किसका नाम जुड़ा, किसका हटा, किसकी आपत्ति सुनी गई और आयोग के भीतर फैसले किस प्रक्रिया से हुए—ये केवल तकनीकी प्रश्न नहीं हैं। इनका सीधा संबंध मतदान के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से है।

क्या 1949 की आशंका 2026 में सच हो रही है?

इस सवाल का सीधा ‘हां’ या ‘नहीं’ में जवाब देना शायद उचित नहीं होगा।

आंबेडकर ने 1949 में किसी भविष्य की सरकार की भविष्यवाणी नहीं की थी। उन्होंने चुनाव आयोग की संरचना में मौजूद एक संभावित संवैधानिक चुनौती की तरफ ध्यान खींचा था—पद की सुरक्षा के साथ नियुक्ति की प्रक्रिया भी ऐसी होनी चाहिए कि संस्था की स्वतंत्रता पर सवाल न उठे।

2026 की परिस्थितियां 1949 से बिल्कुल अलग हैं। देश में सात दशक से अधिक पुराना चुनाव आयोग है, संसद का कानून है, न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था है और आयोग के फैसलों को अदालत में चुनौती देने का अधिकार भी मौजूद है।

फिर भी SIR को लेकर विवाद, आयोग के दो सदस्यों की रिपोर्ट की गई आपत्तियां और नियुक्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस उस पुराने सवाल को फिर सामने जरूर ले आई है। शायद इसलिए आज असली सवाल यह नहीं है कि डॉ. आंबेडकर की आशंका “सच साबित हो गई” या नहीं।

असली सवाल यह है—जिस खतरे को डॉ. आंबेडकर ने 77 साल पहले पहचान लिया था, क्या 2026 की परिस्थितियां हमें उनकी उस संवैधानिक चेतावनी को फिर से पढ़ने और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता तथा पारदर्शिता की संस्थागत सुरक्षा पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर कर रही हैं?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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