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यह पथ निशब्द जाता है

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  यह पथ निशब्द जाता है,
यहाँ श्रुति के पक्षि नहीं चितकारते।
 
यहाँ से पूर्व स्मृति के अगम्य खान हैं,   
जो निशा निशा निरंतर गहराते।
इन तलघरों से जीभकटी शिलाएं 
इस पथ जाती हैं। 
 
यह पथ निशब्द जाता है,
जहाँ भाव के वृक्ष नहीं लग पाते। 
 
यह निशब्द, मेरे भ्रूण का आदि नगर है।
यहाँ विकराल निर्जनी एक जीव सी,    
निमिष निमिष श्वास लेती है, 
लय विलय, 
लय विलय।   
 
यह पथ निशब्द जाता है,
जहाँ ऋतु के पथिक नहीं ठहराते।
 
वर्षा नहीं छुआती, पतझड़ 
पात नहीं बिछाते।
धूप पड़े महीनों दूब नहीं हरियाती,
नहीं फैलाती।
 
यह पथ निशब्द जाता है, 
यह पथ, वर्षों मृत शव से लगा गर्भनाल सा,   
केवल एक इकेले को ले जाता है 
 
जहाँ
नगर निशब्द, 
कोटि योजन फैला, समतल
विरोम है 
 
और उस पथ, उस नगर 
से लौटा मैं नहीं, मेरा 
विलोम है।  

(परिकल्पना, लेखन और आवाज- अरविंद जोशी)
9 वर्ष पहले
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