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टेलीकॉम कंपनियों को झटका: अमेरिका में फिर उठा नेट न्यूट्रिलिटी का मुद्दा, बाइडन प्रशासन ने की नई पहल
Thu, 15 Jul 2021 03:24 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 15 Jul 2021 03:24 PM IST
नेट न्यूट्रिलिटी के तहत, इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां किसी वेबसाइट को ब्लॉक नहीं कर सकेंगी, किसी वेबसाइट की स्पीड स्लो नहीं कर सकेंगी, और न ही किसी कंपनी के साथ सौदा करके उसकी वेबसाइट की स्पीड बढ़ा सकेंगी...
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नेट न्यूट्रिलिटी
- फोटो : For Refernce Only
विस्तार
अमेरिका के जो बाइडन प्रशासन ने नेट न्यूट्रिलिटी के नियमों को फिर से लागू करने की पहल की है। नेट न्यूट्रिलिटी के नियम बराक ओबामा के राष्ट्रपति काल में लागू किए गए थे। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद उनमें छूट दे दी। नेट न्यूट्रिलिटी का मतलब इंटरनेट कंपनियों पर ये नियम लागू करना होता है कि वे अपने प्लैटफॉर्म पर किसी वेबसाइट के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करेंगे। यहां विश्लेषकों का कहना है कि इस पहल से इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ बाइडेन प्रशासन के टकराव की स्थिति बन सकती है।
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गौरतलब है कि अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (एफसीसी) ने 2015 में नेट न्यूट्रिलिटी (इंटरनेट तटस्थता) के नियम तय किए थे। इसके तहत प्रावधान किया गया कि इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां किसी वेबसाइट को ब्लॉक नहीं कर सकेंगी, किसी वेबसाइट की स्पीड स्लो नहीं कर सकेंगी, और न ही किसी कंपनी के साथ सौदा करके उसकी वेबसाइट की स्पीड बढ़ा सकेंगी। अमेरिकी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक राष्ट्रपति जो बाइडन के पिछले हफ्ते मोनोपॉली विरोधी आदेश पर दस्तखत करने के बाद एफसीसी ने नेट न्यूट्रिलिटी के नियमों को बहाल करने की दिशा में पहल की है।
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अपेक्षा के मुताबिक ही नेट सेवा प्रदाता कंपनियों की तरफ से इस पहल पर कड़ी प्रतिक्रिया आई है। इन कंपनियों के संघ एनसीटीए के अध्यक्ष माइकल पॉवेल ने एक बयान में कहा- ‘नेट न्यूट्रिलिटी एक महंगा और समय बर्बाद करने वाला कदम है, जिसका असर दुनिया में न्यूनतम होता है। यह ब्रॉडबैंड के असल मुद्दे से ध्यान हटाने का ड्रामा है। हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ऐसा ब्रॉडबैंड कायम करना है, जिससे आज इंटरनेट सेवा में आने वाली दिक्कतें दूर हो सकें।’
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इंटरनेट सेवा से जुड़े कारोबारियों को अंदेशा है कि नेट न्यूट्रिलिटी के नियमों से सरकार को ब्रॉडबैंड सेवा के शुल्क तय करने का अधिकार मिल जाएगा। उनकी दलील है कि इससे इस क्षेत्र में ज्यादा निवेश के रास्ते में रुकावट आएगी। लेकिन बाइडन प्रशासन के अधिकारियों का मानना है कि इन नियमों के कारण जब नेट सेवा प्रदाता कंपनियों के लिए धन कमाने के दूसरे स्रोत बंद हो जाएंगे, तब वे अपने नेटवर्क के विकास पर ध्यान देंगी। उससे इस क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा।
टेक्नोलॉजी और प्रतिस्पर्धा नीति संबंधी राष्ट्रपति बाइडन के विशेष सहायक टिम वू ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम को दिए एक इंटरव्यू में कहा- ‘नेट न्यूट्रिलिटी के नियमों के अभाव में कंपनियां बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने और उससे अधिक शुल्क कमाने के बजाय दूसरे स्रोतों से धन कमाने की संभावना तलाशने में लगी रहती हैं। चूंकि उनके लिए ऐसे बहुत से स्रोत मौजूद हैं, इसलिए पूंजीगत निवेश के लिए वे प्रेरित नहीं होतीं।’ बताया जाता है कि टिम वू ने ही सबसे पहले नेट न्यूट्रिलिटी शब्द का उपयोग किया था। 2003 में लिखे अपने एक दस्तावेज में उन्होंने ये शब्द गढ़ा था।
विश्लेषकों का कहना है कि इन नियमों को लागू करने के लिए एफसीसी को लंबा रास्ता तय करना होगा। रिपब्लिकन पार्टी इसका कड़ा विरोध करेगी। पार्टी की दलील रही है कि नेट न्यूट्रिलिटी के नियम टेलीकॉम सेक्टर की कंपनियों की स्वतंत्रता में बाधक हैं।