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अमेरिका ने रोका फलस्तीनी राष्ट्रपति का वीजा: यूएनजीए में भारत समेत 152 देशों का मिला समर्थन; आगे क्या होगा?

Fri, 18 Sep 2026 09:03 AM IST
निर्मल कांत आईएएनएस, संयुक्त राष्ट्र।
आईएएनएस, संयुक्त राष्ट्र। Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 18 Sep 2026 09:03 AM IST
सार
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अमेरिका ने फलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को न्यूयॉर्क आने के लिए वीजा नहीं दिया। इसके बाद यूएनजीए में उनके वीडियो लिंक से भाषण का रास्ता खुल गया। वीडियो लिंक के जरिये भाषण की अनुमति वाले प्रस्ताव के समर्थन और विरोध में किन देशों ने वोट दिया, भारत ने किसका साथ दिया। पढ़िए इस रिपोर्ट में। 

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UNGA votes to allow Palestine head address high-level meet via video link after US denies visa
महमूद अब्बास, डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई

विस्तार

भारत ने महासभा के एक प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इसमें फलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को अगले हफ्ते होने वाली उच्च स्तरीय बैठक में वीडियो लिंक के जरिये भाषण देने की अनुमति दी गई है। अमेरिका ने अब्बास को न्यूयॉर्क आने के लिए वीजा देने से इनकार कर दिया था।
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यह प्रस्ताव बुधवार को भारी बहुमत से पारित हुआ। इसके पक्ष में 152 वोट पड़े। सिर्फ अमेरिका, इस्रइल और पराग्वे ने इसके खिलाफ वोट किया। चार देशों ने औपचारिक रूप से मतदान से दूरी बनाई।
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ईरानी राष्ट्रपति को अमेरिका ने वीजा दिया?
हालांकि, वाशिंगटन ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची को उच्च स्तरीय बैठक में शामिल होने के लिए वीजा दिया है। यह तब हुआ है, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध अब सातवें महीने में पहुंच चुका है। यह दूसरी बार होगा, जब अब्बास महासभा में वीडियो लिंक के जरिये भाषण देंगे। पिछले साल भी वीजा नहीं मिलने के बाद उन्होंने वीडियो लिंक के जरिये भाषण दिया था।
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फलस्तीन पर क्या तर्क दिया?
अमेरिका की उप स्थायी प्रतिनिधि टैमी ब्रूस ने अब्बास को वीडियो के जरिये भाषण देने की अनुमति देने से इनकार करने का बचाव किया। उन्होंने फलस्तीन पर आतंकवाद गतिविधियों को छोड़ने से इनकार करने का आरोप लगाया।

ये भी पढ़ें: रियाद को 48 एफ-35 देगा अमेरिका?: हूती-सऊदी तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने उठाया बड़ा कदम; चीन पर भी नजर

उन्होंने कहा, हम इस बात पर जोर देना बंद नहीं करेंगे कि फलस्तीनी प्राधिकरण और पीएलओ (फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन जो प्राधिकरण को नियंत्रित करता है) पूरी तरह और बिना किसी शर्त के आतंकवाद को छोड़ें। उन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है।



फलस्तीन के स्थायी पर्यवेक्षक ने क्या कहा?
फलस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में उसे पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है। फलस्तीन के स्थायी पर्यवेक्षक रियाद मंसूर ने इस्राइल के साथ फलस्तीन के अस्तित्व के अधिकार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि दोनों को 'शांति और सुरक्षा में' साथ रहना चाहिए।

उन्होंने कहा, हमें वीजा देने से इनकार किए जाने का मतलब यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र में मौजूद सबसे बड़ा मुद्दा (फलस्तीनी लोग और उनका नेतृत्व) यहां मौजूद नहीं हैं। उन्होंने कहा, वे यहां पूरी तरह मौजूद हैं।


उन्होंने आगे कहा, और वे तब तक यहां रहेंगे, जब तक हम इस अवैध कब्जे (इस्राइल द्वारा फलस्तीनी क्षेत्र पर कब्जे) को खत्म नहीं कर देते और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की वैश्विक सहमति से द्वि-राष्ट्र समाधान लागू नहीं हो जाता। इसमें 1967 की सीमाओं पर पूर्वी यरुशलम के साथ एक स्वतंत्र और संप्रभु फलस्तीन देश और उसके बगल में इस्राइल देश हो। दोनों शांति और सुरक्षा में रहें। 

चीन और रूस ने किसकी आलोचना की?
चीन और रूस ने भी अब्बास को वीजा नहीं देने को लेकर अमेरिका की आलोचना की। दोनों देशों ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की मेजबानी करने वाले देश के तौर पर अमेरिका की यह जिम्मेदारी है।



सभी पश्चिमी देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। पिछले महीने जब ऐसी खबरें सामने आई थीं कि अब्बास को वीजा नहीं मिलेगा, तब संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने अमेरिका से उन्हें उच्च स्तरीय बैठक में शामिल होने देने की अपील की थी। 

उन्होंने कहा, हमारी अपील और हमारी उम्मीद अभी भी यही है कि मेजबान देश संधि समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियां पूरी करेगा। इसका उद्देश्य उन लोगों के न्यूयॉर्क शहर और अमेरिका आने की यात्रा को आसान बनाना है, जिनका संयुक्त राष्ट्र के सामने काम है। इनमें राजनयिक और सरकारी अधिकारी शामिल हैं। 
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