{"_id":"6a951875160f1add6d070d64","slug":"nepal-flood-caused-by-himalayan-ice-avalanche-rock-landslide-not-heavy-rain-scientific-report-2026-08-31","type":"story","status":"publish","title_hn":"भूकंप, हिमस्खलन या टूटा ग्लेशियर: नेपाल में विनाशकारी जलप्रलय की वजह क्या? रिपोर्ट में नया खुलासा","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
भूकंप, हिमस्खलन या टूटा ग्लेशियर: नेपाल में विनाशकारी जलप्रलय की वजह क्या? रिपोर्ट में नया खुलासा
Mon, 31 Aug 2026 11:30 AM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, काठमांडो
पीटीआई, काठमांडो
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 31 Aug 2026 11:30 AM IST
नेपाल में 26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ को लेकर वैज्ञानिकों के शुरुआती अध्ययन ने इसकी वजह पर नई जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र से बर्फ, चट्टानों और मलबे का विशाल हिस्सा टूटकर नदी में गिरा, जिससे बेहद तेज बहाव पैदा हुआ। शोधकर्ताओं को अत्यधिक बारिश या ग्लेशियल झील के अचानक फटने से आपदा शुरू होने के प्रमाण नहीं मिले।
विज्ञापन
नेपाल बाढ़
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में तबाही मचाने वाली बाढ़ सामान्य बारिश के कारण नहीं, बल्कि ऊंचे हिमालय में बड़े पैमाने पर हुए हिमस्खलन और भूस्खलन से आई थी। नेपाली वैज्ञानिकों की प्रारंभिक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है कि बर्फ और चट्टानों के एक साथ गिरने से यह बाढ़ आई। नेपाल पर्यावरण सोसायटी के कहने पर तैयार की गई यह रिपोर्ट रविवार को जारी की गई।
अध्ययन के अनुसार, रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ, चट्टानों और मलबे का एक विशाल हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी में जा गिरा। इसके बाद तेज बहाव भोटेकोशी नदी से होते हुए त्रिशूली नदी तक पहुंचा और अपने साथ भारी मात्रा में मलबा लेकर आगे बढ़ा।
26 अगस्त को आई इस आपदा ने नेपाल के उत्तरी और मध्य हिस्सों के कई कस्बों और गांवों में भारी तबाही मचाई थी। अधिकारियों के अनुसार, नेपाल में अचानक आई बाढ़ से मरने वालों की संख्या सोमवार को बढ़कर 903 हो गई है। शवों की बरामदगी अभी जारी है।
विज्ञापन
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आपदा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ के कारण नहीं हुई थी। शोधकर्ताओं ने उपग्रह तस्वीरों, जल विज्ञान और मौसम संबंधी आंकड़ों, भू-भाग की विशेषताओं तथा नदी तंत्र में ऊंचाई और ढलान में आए बदलावों का विश्लेषण किया। अध्ययन में ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ का कोई प्रमाण नहीं मिला।
अध्ययन के मुताबिक, बुधवार सुबह करीब 8:37 बजे लांगटांग-लिरुंग के उत्तरी हिस्से से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा नीचे गिरना शुरू हुआ। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से यह तेज ढलान वाले इलाके से नीचे आया और लगभग 2,930 मीटर की ऊंचाई पर ल्हेंदे नदी में जा पहुंचा। उपग्रह तस्वीरों में करीब 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बड़े भौगोलिक बदलाव दिखाई दिए। वहीं, करीब 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ग्लेशियर का एक हिस्सा भी टूटकर अलग हो गया।
हालांकि, विशेषज्ञों ने कहा कि इसके पीछे की सटीक भूगर्भीय प्रक्रिया, पिघलती बर्फ के योगदान और क्या ऊपर की ओर नदी का पानी कुछ समय के लिए रुका था, यह पता लगाने के लिए मौके पर आगे जांच की जरूरत है। रिपोर्ट के अनुसार, बर्फ-चट्टान का यह विशाल मलबा महज सात मिनट से कुछ अधिक समय में करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय कर रसुवागढ़ी पहुंच गया। इसकी अनुमानित औसत गति 46.3 मीटर प्रति सेकंड यानी करीब 167 किलोमीटर प्रति घंटा थी।
रसुवागढ़ी से बेत्रावती के बीच इसकी गति घटकर करीब 73 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई। इसके बाद नीचे की ओर यह करीब 22 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ा। गति कम होने के बावजूद बहाव अपने साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, तलछट और मिट्टी लेकर आगे बढ़ता रहा। अध्ययन में यह भी पाया गया कि बाढ़ पहुंचने से कई घंटे पहले रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी इलाकों में नदी का जलस्तर और बहाव कम हो गया था।
रसुवागढ़ी में सुबह पांच बजे से आठ बजे के बीच पानी का औसत स्तर घटा, जबकि स्याफ्रुबेसी में नदी का बहाव सुबह करीब सात बजे से कम होना शुरू हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि उस दिन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में असाधारण रूप से भारी बारिश के भी कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि आपदा केवल अत्यधिक बारिश या बादल फटने के कारण हुई थी।
आपदा से जलविद्युत ढांचे को भी भारी नुकसान हुआ। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के प्रारंभिक आंकड़ों का हवाला देते हुए अध्ययन में कहा गया कि 13 जलविद्युत परियोजनाएं और एक सौर परियोजना प्रभावित हुईं। इससे करीब 431 मेगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता व्यवस्था से बाहर हो गई।
सरकार के प्रारंभिक आकलन का हवाला देते हुए अध्ययन में आर्थिक नुकसान करीब तीन लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों में हुए नुकसान का विस्तृत आकलन अभी किया जा रहा है।
विज्ञापन
अध्ययन के अनुसार, रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ, चट्टानों और मलबे का एक विशाल हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी में जा गिरा। इसके बाद तेज बहाव भोटेकोशी नदी से होते हुए त्रिशूली नदी तक पहुंचा और अपने साथ भारी मात्रा में मलबा लेकर आगे बढ़ा।
विज्ञापन
26 अगस्त को आई इस आपदा ने नेपाल के उत्तरी और मध्य हिस्सों के कई कस्बों और गांवों में भारी तबाही मचाई थी। अधिकारियों के अनुसार, नेपाल में अचानक आई बाढ़ से मरने वालों की संख्या सोमवार को बढ़कर 903 हो गई है। शवों की बरामदगी अभी जारी है।
विज्ञापन
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आपदा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ के कारण नहीं हुई थी। शोधकर्ताओं ने उपग्रह तस्वीरों, जल विज्ञान और मौसम संबंधी आंकड़ों, भू-भाग की विशेषताओं तथा नदी तंत्र में ऊंचाई और ढलान में आए बदलावों का विश्लेषण किया। अध्ययन में ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ का कोई प्रमाण नहीं मिला।
अध्ययन के मुताबिक, बुधवार सुबह करीब 8:37 बजे लांगटांग-लिरुंग के उत्तरी हिस्से से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा नीचे गिरना शुरू हुआ। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से यह तेज ढलान वाले इलाके से नीचे आया और लगभग 2,930 मीटर की ऊंचाई पर ल्हेंदे नदी में जा पहुंचा। उपग्रह तस्वीरों में करीब 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बड़े भौगोलिक बदलाव दिखाई दिए। वहीं, करीब 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ग्लेशियर का एक हिस्सा भी टूटकर अलग हो गया।
हालांकि, विशेषज्ञों ने कहा कि इसके पीछे की सटीक भूगर्भीय प्रक्रिया, पिघलती बर्फ के योगदान और क्या ऊपर की ओर नदी का पानी कुछ समय के लिए रुका था, यह पता लगाने के लिए मौके पर आगे जांच की जरूरत है। रिपोर्ट के अनुसार, बर्फ-चट्टान का यह विशाल मलबा महज सात मिनट से कुछ अधिक समय में करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय कर रसुवागढ़ी पहुंच गया। इसकी अनुमानित औसत गति 46.3 मीटर प्रति सेकंड यानी करीब 167 किलोमीटर प्रति घंटा थी।
रसुवागढ़ी से बेत्रावती के बीच इसकी गति घटकर करीब 73 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई। इसके बाद नीचे की ओर यह करीब 22 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ा। गति कम होने के बावजूद बहाव अपने साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, तलछट और मिट्टी लेकर आगे बढ़ता रहा। अध्ययन में यह भी पाया गया कि बाढ़ पहुंचने से कई घंटे पहले रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी इलाकों में नदी का जलस्तर और बहाव कम हो गया था।
रसुवागढ़ी में सुबह पांच बजे से आठ बजे के बीच पानी का औसत स्तर घटा, जबकि स्याफ्रुबेसी में नदी का बहाव सुबह करीब सात बजे से कम होना शुरू हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि उस दिन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में असाधारण रूप से भारी बारिश के भी कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि आपदा केवल अत्यधिक बारिश या बादल फटने के कारण हुई थी।
आपदा से जलविद्युत ढांचे को भी भारी नुकसान हुआ। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के प्रारंभिक आंकड़ों का हवाला देते हुए अध्ययन में कहा गया कि 13 जलविद्युत परियोजनाएं और एक सौर परियोजना प्रभावित हुईं। इससे करीब 431 मेगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता व्यवस्था से बाहर हो गई।
सरकार के प्रारंभिक आकलन का हवाला देते हुए अध्ययन में आर्थिक नुकसान करीब तीन लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों में हुए नुकसान का विस्तृत आकलन अभी किया जा रहा है।