{"_id":"6a940de60e48b92731040954","slug":"iceland-voters-reject-proposal-restart-eu-membership-talks-2026-08-30","type":"story","status":"publish","title_hn":"आइसलैंड ने खारिज किया ईयू में शामिल होने का प्रस्ताव: एक दशक बाद फिर छिड़ी थी बहस, क्या है पूरा मामला?","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
आइसलैंड ने खारिज किया ईयू में शामिल होने का प्रस्ताव: एक दशक बाद फिर छिड़ी थी बहस, क्या है पूरा मामला?
Sun, 30 Aug 2026 04:33 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, रेक्याविक।
पीटीआई, रेक्याविक।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sun, 30 Aug 2026 04:33 PM IST
आइसलैंड के मतदाताओं ने यूरोपीय संघ के साथ पुनः सदस्यता वार्ता शुरू करने के प्रस्ताव को 52.8% बनाम 47.2% के मामूली अंतर से खारिज कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों के बाद सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए सरकार ने यह जनमत संग्रह कराया था। ईयू समर्थकों ने आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा का हवाला दिया, जबकि विरोधियों ने स्थानीय मछली पालन उद्योग और देश की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हुए ईयू में शामिल होने का विरोध किया।
विज्ञापन
आईसलैंड ने ईयू में शामिल होने से किया इनकार
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आइसलैंड में एक दशक से शांत पड़ा यूरोपीय संघ में शामिल होने का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। देश की जनता से जब एक सीधे सवाल के जरिए पूछा गया कि क्या आइसलैंड को फिर से यूरोपीय संघ में शामिल होने की बातचीत शुरू करनी चाहिए, तो बहुमत ने इसे साफ तौर पर खारिज कर दिया। राष्ट्रीय प्रसारक आरयूवी की रिपोर्ट के अनुसार, 52.8 प्रतिशत लोगों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया, जबकि 47.2 प्रतिशत लोगों ने ही इसका समर्थन किया।
डोनाल्ड ट्रंप के बयान से बढ़ा तनाव
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पड़ोसी ग्रीनलैंड को लेकर कई बयान दिए थे, जिसके बाद यह जनमत संग्रह आयोजित किया गया। बातचीत के दौरान ट्रंप ने गलती से चार बार 'ग्रीनलैंड' की जगह 'आइसलैंड' का नाम ले लिया था। इसी बयान और सुरक्षा की चिंता को देखते हुए 2024 में चुनी गई आइसलैंड की वामपंथी गठबंधन सरकार ने अगले साल होने वाले जनमत संग्रह को इसी शनिवार को कराने का फैसला किया। ईयू समर्थकों का मानना था कि नाटो सदस्य होने के बावजूद ईयू के साथ जुड़ने से देश को अमेरिकी धमकियों और राजनीतिक दबाव के खिलाफ ज़्यादा सुरक्षा मिलेगी।
वोटों की गिनती में बना रहा सस्पेंस
शनिवार को करीब दो लाख 65 हजार योग्य मतदाताओं के सामने केवल 'हां' या 'न' का विकल्प था। शनिवार रात जब वोटों की गिनती शुरू हुई तो शुरुआत में 'हां' पक्ष आगे चल रहा था और पूरे देश में सस्पेंस बना हुआ था। हालांकि, तड़के सुबह तक 'न' कहने वाले वोटों की संख्या बढ़ने लगी। शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच सिर्फ कुछ सौ वोटों का अंतर था, लेकिन जैसे ही राजधानी रेक्याविक के बाहर के इलाकों से मतपत्र गिने गए, विरोधियों की बढ़त मजबूत होती चली गई।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें: पीएम मोदी को उज्बेकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान: अब तक 36 देशों ने किया सम्मानित; कब-कब बढ़ा भारत का मान?
मछली पालन और संप्रभुता बना बड़ा मुद्दा
यूरोपीय संघ का विरोध करने वाले समूह का सबसे बड़ा हथियार देश का 'फिशिंग सेक्टर' (मछली पालन उद्योग) था। विरोधियों का कहना था कि आइसलैंड पहले से ही ईयू के सिंगल मार्केट और शेंगेन फ्री-टैवल जोन ( यानी यूरोप का एक ऐसा क्षेत्र,जहां देश आपस में अपनी सीमाओं पर पासपोर्ट और अन्य सीमा जांच को समाप्त कर चुके हैं) के फायदों का लाभ उठा रहा है। ऐसे में पूर्ण सदस्यता लेकर देश की संप्रभुता से समझौता करने की कोई जरूरत नहीं है। उनका यह भी तर्क था कि इतने बड़े यूरोपीय संसद में आइसलैंड की आवाज दब जाएगी और देश के लिए चीन जैसे देशों के साथ स्वतंत्र व्यापार समझौते करना ही फायदेमंद होगा।
महंगाई और आर्थिक स्थिरता की दलीलें खारिज
दूसरी ओर, ईयू में शामिल होने के समर्थकों का तर्क था कि संघ में जाने से देश में महंगाई और ब्याज दरें कम होंगी। आइसलैंड की अपनी मुद्रा 'क्रोना' की तुलना में 'यूरो' देश में अधिक आर्थिक स्थिरता लाएगा। समर्थकों का यह भी मानना था कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए यूरोपीय पड़ोसियों के साथ मिलकर काम करना देश के हित में होगा। हालांकि, अंतिम नतीजों से साफ हो गया कि जनता ने आर्थिक स्थिरता की जगह अपनी संप्रभुता को प्राथमिकता दी है।
विज्ञापन
डोनाल्ड ट्रंप के बयान से बढ़ा तनाव
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पड़ोसी ग्रीनलैंड को लेकर कई बयान दिए थे, जिसके बाद यह जनमत संग्रह आयोजित किया गया। बातचीत के दौरान ट्रंप ने गलती से चार बार 'ग्रीनलैंड' की जगह 'आइसलैंड' का नाम ले लिया था। इसी बयान और सुरक्षा की चिंता को देखते हुए 2024 में चुनी गई आइसलैंड की वामपंथी गठबंधन सरकार ने अगले साल होने वाले जनमत संग्रह को इसी शनिवार को कराने का फैसला किया। ईयू समर्थकों का मानना था कि नाटो सदस्य होने के बावजूद ईयू के साथ जुड़ने से देश को अमेरिकी धमकियों और राजनीतिक दबाव के खिलाफ ज़्यादा सुरक्षा मिलेगी।
विज्ञापन
वोटों की गिनती में बना रहा सस्पेंस
शनिवार को करीब दो लाख 65 हजार योग्य मतदाताओं के सामने केवल 'हां' या 'न' का विकल्प था। शनिवार रात जब वोटों की गिनती शुरू हुई तो शुरुआत में 'हां' पक्ष आगे चल रहा था और पूरे देश में सस्पेंस बना हुआ था। हालांकि, तड़के सुबह तक 'न' कहने वाले वोटों की संख्या बढ़ने लगी। शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच सिर्फ कुछ सौ वोटों का अंतर था, लेकिन जैसे ही राजधानी रेक्याविक के बाहर के इलाकों से मतपत्र गिने गए, विरोधियों की बढ़त मजबूत होती चली गई।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें: पीएम मोदी को उज्बेकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान: अब तक 36 देशों ने किया सम्मानित; कब-कब बढ़ा भारत का मान?
मछली पालन और संप्रभुता बना बड़ा मुद्दा
यूरोपीय संघ का विरोध करने वाले समूह का सबसे बड़ा हथियार देश का 'फिशिंग सेक्टर' (मछली पालन उद्योग) था। विरोधियों का कहना था कि आइसलैंड पहले से ही ईयू के सिंगल मार्केट और शेंगेन फ्री-टैवल जोन ( यानी यूरोप का एक ऐसा क्षेत्र,जहां देश आपस में अपनी सीमाओं पर पासपोर्ट और अन्य सीमा जांच को समाप्त कर चुके हैं) के फायदों का लाभ उठा रहा है। ऐसे में पूर्ण सदस्यता लेकर देश की संप्रभुता से समझौता करने की कोई जरूरत नहीं है। उनका यह भी तर्क था कि इतने बड़े यूरोपीय संसद में आइसलैंड की आवाज दब जाएगी और देश के लिए चीन जैसे देशों के साथ स्वतंत्र व्यापार समझौते करना ही फायदेमंद होगा।
महंगाई और आर्थिक स्थिरता की दलीलें खारिज
दूसरी ओर, ईयू में शामिल होने के समर्थकों का तर्क था कि संघ में जाने से देश में महंगाई और ब्याज दरें कम होंगी। आइसलैंड की अपनी मुद्रा 'क्रोना' की तुलना में 'यूरो' देश में अधिक आर्थिक स्थिरता लाएगा। समर्थकों का यह भी मानना था कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए यूरोपीय पड़ोसियों के साथ मिलकर काम करना देश के हित में होगा। हालांकि, अंतिम नतीजों से साफ हो गया कि जनता ने आर्थिक स्थिरता की जगह अपनी संप्रभुता को प्राथमिकता दी है।