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Bageshwar News: हुकूमत ने नहीं सुनी...पगडंडी पर पसीने से उम्मीद तराश रहे चंचल-हीरा

Thu, 20 Aug 2026 11:43 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर Updated Thu, 20 Aug 2026 11:43 PM IST
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The government didn't listen... Chanchal and Heera are carving hope out of sweat on the dusty trail.
कपकोट के झोपड़ा में रास्ता बनाते ग्रामीण।
कपकोट (बागेश्वर)। सरकारी दफ्तरों की चौखट पर सड़क की गुहार लगाते-लगाते जब झोपड़ा गांव के ग्रामीण थक गए तो एक किसान दंपती ने इंतजार छोड़कर खुद ही राह तराशने की ठान ली। चंचल सिंह कोरंगा और उनकी पत्नी हीरा देवी खेती के काम से समय निकालकर सुबह-शाम पथरीली पगडंडी से पत्थर-मलबा हटाकर उसे चौड़ा और सुगम बना रहे हैं। उनकी मेहनत का मकसद गांव के 70 परिवारों के लिए कम से कम पैदल आवाजाही आसान करना है।
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कपकोट तहसील का झोपड़ा गांव आजादी के दशकों बाद भी सड़क सुविधा से वंचित है। ग्रामीणों को बुनियादी जरूरतों, इलाज और शिक्षा के लिए करीब तीन किलोमीटर की सीधी और जोखिमभरी पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। इस रास्ते की सबसे ज्यादा मार स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को झेलनी पड़ती है।
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ग्रामीणों के मुताबिक सड़क निर्माण की मांग को लेकर वे कई बार शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगा चुके हैं। हर बार आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। सरकारी तंत्र की बेरुखी से निराश ग्रामीणों ने अब आपसी सहयोग से अपनी राह आसान करने का प्रयास शुरू किया है।
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झोपड़ा निवासी किसान चंचल सिंह कोरंगा और उनकी धर्मपत्नी हीरा देवी रोजाना खेती-किसानी के काम से समय निकालकर पगडंडी को सुगम बनाने में जुटे हैं। दंपती अपने संसाधनों और मेहनत से रास्ते को चौड़ा कर रहा है, ताकि ग्रामीणों और बच्चों को पैदल आवाजाही के दौरान फिसलने या चोटिल होने का खतरा कम हो।
दंपती की पहल देखकर गांव के अन्य लोग भी आगे आए हैं। ग्रामीण शंकर सिंह, राजेंद्र सिंह, गोपुली देवी और खीम सिंह कोरंगा भी रास्ता बनाने में हाथ बंटा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकार उनकी सुध नहीं ले रही है तो वे आपसी सहयोग से ही अपनी राहों को आसान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

चंचल सिंह कोरंगा ने बताया कि गांव के रास्ते इतने बदहाल हैं कि बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों का चलना मुश्किल हो जाता है। कई बार शासन-प्रशासन से गुहार लगाने के बाद भी जब सुध नहीं ली गई तो हमने खुद ही कुदाल उठाने का फैसला किया। खेती के काम से समय निकालकर हम रास्ता तैयार कर रहे हैं। -, ग्रामीण, झोपड़ा
हीरा देवी ने बताया कि रोजाना इस खतरनाक पैदल रास्ते से होकर बच्चों और बुजुर्गों को गुजरते देखना बेहद तकलीफ देह था। जब सरकार से कोई मदद नहीं मिली तो मैंने और मेरे पति ने तय किया कि हम खुद ही रास्ता बनाएंगे। अब मुहिम में ग्रामीणों का भी साथ मिल रहा है। जब तक पैदल चलने लायक सुगम रास्ता नहीं बन जाता, हम अपनी मेहनत जारी रखेंगे।

एसडीएम, अनिल चन्याल ने बताया कि गांवों में पैदल रास्तों के निर्माण और मरम्मत के लिए राज्य वित्त और अन्य मदों से पंचायतों को बजट आवंटित किया जाता है जिससे प्राथमिकता के आधार पर ऐसे पैदल मार्गों का निर्माण होना चाहिए। यदि झोपड़ा गांव में अभी तक मार्ग का निर्माण नहीं हुआ है तो इस संबंध में एडीओ पंचायत से जांच कराई जाएगी।
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