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Mathura News: बत्तीसी बकरी और ब्रज गधे को मान्यता
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मथुरा। उ.प्र. पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो-अनुसंधान संस्थान को पशु आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण क्षेत्र में बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मिली है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल ने बत्तीसी बकरी और ब्रज गधे को राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन रजिस्टर में पंजीकृत किया है। इससे प्रदेश सहित देश की स्वदेशी पशु जैव-विविधता के संरक्षण को नई दिशा मिलेगी।
कुलपति डॉ. अभिजित मित्र ने वैज्ञानिक टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह वैज्ञानिक उपलब्धि अब इनके संरक्षण, संवर्धन, वैज्ञानिक प्रजनन और समुदाय आधारित कार्यक्रमों को और मजबूत करेगा। आईसीएआर-एनबीएजीआर द्वारा वित्तपोषित नेटवर्क प्रोजेक्ट ऑन एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज के तहत विश्वविद्यालय की टीम ने करीब दो वर्ष तक क्षेत्रीय सर्वेक्षण, बाह्य एवं प्रजनन संबंधी लक्षणों का अध्ययन, पशुपालकों से संवाद, प्रजनन क्षेत्र के निर्धारण और आंकड़ों के संकलन के बाद पंजीकरण प्रस्ताव तैयार किया। इसमें पशु प्रजनन एवं संवर्धन विभाग के प्रधान अन्वेषक डॉ. अवनीश कुमार, सह अन्वेषक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा, सह अन्वेषक डॉ. एसपी सिंह, पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय के सह अन्वेषक एवं अधिष्ठाता डॉ. विकास पाठक तथा पशु चिकित्सा शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के सह अन्वेषक डॉ. मुकुल आनंद शामिल रहे। इससे नस्ल-विशिष्ट संरक्षण योजना, वैज्ञानिक प्रजनन, आनुवंशिक सुधार और सतत उपयोग का आधार तैयार होगा।
राजस्थान से सटे इलाकों में मिलती है बत्तीसी बकरी
बत्तीसी बकरी राजस्थान के अलवर जिले और उससे लगे ब्रज के बरसाना, गोवर्धन व आसपास के पथरीले क्षेत्रों में पाई जाती है। इसके सफेद चेहरे, छाती, पेट और पैरों पर काली धारी होती हैं। वहीं मजबूत शरीर और पथरीले भूभाग और जलवायु में अनुकूलित तथा दूध और मांस दोनों के लिए उपयोगी है।
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वहीं ब्रज गधा मथुरा और आसपास के ब्रज क्षेत्र की स्वदेशी नस्ल है। सफेद-धूसर रंग, मजबूत शरीर और कठिन परिस्थितियां सहने की क्षमता के कारण इसका परंपरागत उपयोग ईंट, बालू आदि निर्माण सामग्री ढोने में होता है। देश में गधों की घटती संख्या के बीच इसका पंजीकरण संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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कुलपति डॉ. अभिजित मित्र ने वैज्ञानिक टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह वैज्ञानिक उपलब्धि अब इनके संरक्षण, संवर्धन, वैज्ञानिक प्रजनन और समुदाय आधारित कार्यक्रमों को और मजबूत करेगा। आईसीएआर-एनबीएजीआर द्वारा वित्तपोषित नेटवर्क प्रोजेक्ट ऑन एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज के तहत विश्वविद्यालय की टीम ने करीब दो वर्ष तक क्षेत्रीय सर्वेक्षण, बाह्य एवं प्रजनन संबंधी लक्षणों का अध्ययन, पशुपालकों से संवाद, प्रजनन क्षेत्र के निर्धारण और आंकड़ों के संकलन के बाद पंजीकरण प्रस्ताव तैयार किया। इसमें पशु प्रजनन एवं संवर्धन विभाग के प्रधान अन्वेषक डॉ. अवनीश कुमार, सह अन्वेषक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा, सह अन्वेषक डॉ. एसपी सिंह, पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय के सह अन्वेषक एवं अधिष्ठाता डॉ. विकास पाठक तथा पशु चिकित्सा शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के सह अन्वेषक डॉ. मुकुल आनंद शामिल रहे। इससे नस्ल-विशिष्ट संरक्षण योजना, वैज्ञानिक प्रजनन, आनुवंशिक सुधार और सतत उपयोग का आधार तैयार होगा।
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राजस्थान से सटे इलाकों में मिलती है बत्तीसी बकरी
बत्तीसी बकरी राजस्थान के अलवर जिले और उससे लगे ब्रज के बरसाना, गोवर्धन व आसपास के पथरीले क्षेत्रों में पाई जाती है। इसके सफेद चेहरे, छाती, पेट और पैरों पर काली धारी होती हैं। वहीं मजबूत शरीर और पथरीले भूभाग और जलवायु में अनुकूलित तथा दूध और मांस दोनों के लिए उपयोगी है।
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वहीं ब्रज गधा मथुरा और आसपास के ब्रज क्षेत्र की स्वदेशी नस्ल है। सफेद-धूसर रंग, मजबूत शरीर और कठिन परिस्थितियां सहने की क्षमता के कारण इसका परंपरागत उपयोग ईंट, बालू आदि निर्माण सामग्री ढोने में होता है। देश में गधों की घटती संख्या के बीच इसका पंजीकरण संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।