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Barabanki News: रेशमी धागों में स्वाभिमान बुन बन रही आत्मनिर्भर
Sat, 22 Aug 2026 01:52 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Sat, 22 Aug 2026 01:52 AM IST
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रामनगर। रेशमी धागों की गांठ अब सिर्फ रिश्तों को नहीं बांध रही बल्कि महिलाओं के स्वाभिमान को नया हौसला भी दे रही है। रक्षाबंधन के पर्व ने रामनगर की ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी में उम्मीदों की नई मिठास घोल दी है। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं अपने हुनर के दम पर न केवल घर की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिख रही हैं।
ग्राम पंचायत गोबरहा की कहानी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यहां जय माता दी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने अपनी मेहनत और कलात्मक सोच से रक्षाबंधन के लिए करीब पांच हजार आकर्षक स्वदेशी राखियां तैयार की हैं। बाजार से रेशमी व सूती धागे, मोती, लेस, गोटा और धार्मिक प्रतीक चिन्ह खरीदकर महिलाओं ने बेहद खूबसूरत राखियां गढ़ी हैं। समूह की सदस्य मीनू यादव बताती हैं कि एक राखी बनाने में 15 से 20 मिनट का समय लगता है। व्यापारियों से सीधे ऑर्डर मिलने के कारण बिक्री की कोई चिंता नहीं है। 40 से 50 रुपये में बिकने वाली इन राखियों पर लागत निकालने के बाद महिलाओं को 20 से 30 फीसदी का सीधा मुनाफा मिल रहा है, जिससे वे अपने परिवार के खर्च में मजबूती से हाथ बटा रही हैं। (संवाद)
बाजारों में दिखा बदलाव, स्वदेशी खास पसंद
रामनगर के बाजारों में इस बार स्वदेशी और प्राकृतिक राखियों का बोलबाला है। बच्चों के लिए कार्टून वाली राखियों के अलावा रेशम के धागे, रुद्राक्ष, चंदन और मोतियों से सजी राखियां महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई हैं। दुकानदारों के मुताबिक, चीनी सामान के बजाय लोग अब स्थानीय स्तर पर बनी स्वदेशी राखियों को ही तवज्जो दे रहे हैं।
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रेशमी धागों में बहनों का प्रेम
बाजार में खरीदारी करने पहुंची स्थानीय निवासी कल्पना, ममता और शिल्पी का कहना है कि स्वदेशी राखियों में जो अपनत्व और मेहनत की खुशबू है, वह बाजार की मशीनी राखियों में कहा। वह इस बार भी अपने भाइयों की कलाई पर अपने ही क्षेत्र की महिलाओं द्वारा तैयार स्वदेशी राखियां ही बांधेंगी। स्थानीय स्तर पर तैयार इन राखियों की बढ़ती मांग ने यह साबित कर दिया है कि जब हुनर को सही दिशा और अवसर मिलता है तो ग्रामीण भारत की महिलाएं आत्मनिर्भरता की सबसे मजबूत मिसाल बन जाती हैं।
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ग्राम पंचायत गोबरहा की कहानी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यहां जय माता दी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने अपनी मेहनत और कलात्मक सोच से रक्षाबंधन के लिए करीब पांच हजार आकर्षक स्वदेशी राखियां तैयार की हैं। बाजार से रेशमी व सूती धागे, मोती, लेस, गोटा और धार्मिक प्रतीक चिन्ह खरीदकर महिलाओं ने बेहद खूबसूरत राखियां गढ़ी हैं। समूह की सदस्य मीनू यादव बताती हैं कि एक राखी बनाने में 15 से 20 मिनट का समय लगता है। व्यापारियों से सीधे ऑर्डर मिलने के कारण बिक्री की कोई चिंता नहीं है। 40 से 50 रुपये में बिकने वाली इन राखियों पर लागत निकालने के बाद महिलाओं को 20 से 30 फीसदी का सीधा मुनाफा मिल रहा है, जिससे वे अपने परिवार के खर्च में मजबूती से हाथ बटा रही हैं। (संवाद)
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बाजारों में दिखा बदलाव, स्वदेशी खास पसंद
रामनगर के बाजारों में इस बार स्वदेशी और प्राकृतिक राखियों का बोलबाला है। बच्चों के लिए कार्टून वाली राखियों के अलावा रेशम के धागे, रुद्राक्ष, चंदन और मोतियों से सजी राखियां महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई हैं। दुकानदारों के मुताबिक, चीनी सामान के बजाय लोग अब स्थानीय स्तर पर बनी स्वदेशी राखियों को ही तवज्जो दे रहे हैं।
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रेशमी धागों में बहनों का प्रेम
बाजार में खरीदारी करने पहुंची स्थानीय निवासी कल्पना, ममता और शिल्पी का कहना है कि स्वदेशी राखियों में जो अपनत्व और मेहनत की खुशबू है, वह बाजार की मशीनी राखियों में कहा। वह इस बार भी अपने भाइयों की कलाई पर अपने ही क्षेत्र की महिलाओं द्वारा तैयार स्वदेशी राखियां ही बांधेंगी। स्थानीय स्तर पर तैयार इन राखियों की बढ़ती मांग ने यह साबित कर दिया है कि जब हुनर को सही दिशा और अवसर मिलता है तो ग्रामीण भारत की महिलाएं आत्मनिर्भरता की सबसे मजबूत मिसाल बन जाती हैं।