{"_id":"6a86f3c104aecd36a20e3062","slug":"trend-of-approaching-the-high-court-directly-to-lodge-an-fir-is-concerning-2026-08-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"हाईकोर्ट : एफआईआर दर्ज कराने के लिए सीधे उच्च न्यायालय आने की प्रवृत्ति चिंताजनक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हाईकोर्ट : एफआईआर दर्ज कराने के लिए सीधे उच्च न्यायालय आने की प्रवृत्ति चिंताजनक
Thu, 20 Aug 2026 06:02 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 20 Aug 2026 06:02 PM IST
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने के बजाय सीधे उच्च न्यायालय आने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई है।
विज्ञापन
कोर्ट का आदेश।
- फोटो : अमर उजाला।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने के बजाय सीधे उच्च न्यायालय आने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि हर एफआईआर के मामले में सीधे हाईकोर्ट आने से न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है। मजिस्ट्रेट को कानून की ओर से दी गई भूमिका भी प्रभावित होती है।
विज्ञापन
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने प्रयागराज के झूंसी निवासी अमित कुमार श्रीवास्तव की याचिका खारिज कर दी। याची ने कथित फायरिंग की घटना को लेकर एफआईआर दर्ज करने के लिए झूंसी थाने को निर्देश देने की मांग की थी। आरोप लगाया था कि अगस्त 2025 को शाम करीब सात बजे रहीमापुर के पास दो बाइक पर सवार चार अज्ञात लोगों ने उसकी कार पर फायरिंग की। पुलिस ने शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
विज्ञापन
याची के अधिवक्ता ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला दिया। कहा कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। यह भी आरोप लगाया कि झूंसी के थानाध्यक्ष आरोपियों से मिले हैं। वहीं, अपर शासकीय अधिवक्ता ने आरोपों को झूठा और मनगढ़ंत बताया। कहा कि पुलिस की मौके पर जांच में कथित फायरिंग के कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले।
विज्ञापन
कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में तथ्यों को लेकर विवाद है तो अनुच्छेद-226 के तहत सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना उचित नहीं है। एफआईआर दर्ज नहीं होने की स्थिति में शिकायतकर्ता को पहले बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संपर्क करना चाहिए। इसके बाद भी राहत न मिलने पर धारा-175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया जा सकता है।