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हिमाचल: प्रदेश में इंसानी दखल और अवैज्ञानिक कटान से भी दरक रहे पहाड़, 2025 में 4,644 भूस्खलन दर्ज
Wed, 16 Sep 2026 11:43 AM IST
Ankesh Dogra
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Wed, 16 Sep 2026 11:43 AM IST
हिमाचल प्रदेश में पहाड़ों के धंसने के लिए केवल भारी बारिश ही जिम्मेदार नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार, कमजोर भूगर्भीय संरचना, सड़क निर्माण के लिए अवैज्ञानिक कटान, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव से भी ढलानें अस्थिर हो रही हैं। पढ़ें पूरी खबर...
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हिमाचल में दरक रहे पहाड़।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
हिमाचल प्रदेश में पहाड़ों के धंसने के लिए केवल भारी बारिश ही जिम्मेदार नहीं है। कमजोर भूगर्भीय संरचना, अवैज्ञानिक कटान व अनियोजित निर्माण से प्रदेश के पहाड़ दरक रहे हैं। 2025 में मई से सितंबर तक भूस्खलन की 4,644 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें से सबसे ज्यादा कुल्लू जिला में हुई हैं। अध्ययन में यह बातें सामने आई हैं। यह अध्ययन निदेशक आपदा प्रबंधन एवं विशेष सचिव डॉ. पुष्पेंद्र राणा, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. रितेश कपूर और राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र की साइंटिफिक प्रोफेशनल नेहा ठाकुर ने संयुक्त रूप से किया है।
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इस अध्ययन में मई से सितंबर 2025 के बीच सेंटिनल-2 उपग्रह डाटा से प्रदेश में 4,644 भूस्खलन मानचित्र तैयार किए गए। इन कमजोर और नाजुक भूगर्भीय बनावट, खड़ी ढलान, नदी कटाव के साथ सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों की अवैज्ञानिक कटाई, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव भी ढलानों को अस्थिर कर रहे हैं। सड़कों के निर्माण और चौड़ीकरण के दौरान अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ काटने से ढलानों की प्राकृतिक स्थिरता प्रभावित होती है। ढलानों और नदी घाटियों में बस्तियों, होटलों और अन्य बुनियादी ढांचे के अनियोजित विस्तार से प्राकृतिक जल निकासी प्रभावित हो रही है। जंगलों की कटाई और प्राकृतिक नालों के प्रवाह में बाधा भी बारिश के पानी के बहाव को बदलकर ढलानों को नाजुक बना रही है।
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रिपोर्ट के अनुसार 2025 में कुल्लू सबसे अधिक प्रभावित रहा है। यहां 1,335 भूस्खलन से 1,310.98 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ। मंडी में 798 घटनाओं से 623.34 हेक्टेयर, कांगड़ा में 526 घटनाओं से 307.95 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ।
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बारिश ट्रिगर, लेकिन अकेली वजह नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार भूस्खलन के लिए केवल बारिश की मात्रा को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। यह केवल ट्रिगर है। कुल्लू में 1,017.2 मिलीमीटर बारिश के बावजूद भूस्खलन सबसे अधिक हुए। पश्चिमी हिमालय की कमजोर भूगर्भीय बनावट के कारण यहां की चट्टानें और ढलानें अपेक्षाकृत संवेदनशील हैं। मूसलाधार बारिश से मिट्टी में पानी व दबाव बढ़ता है, जबकि कम समय में अत्यधिक बारिश और बादल फटने से अचानक भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
आठ साल में 6,494 बड़े भूस्खलन
2018 से 2025 के बीच प्रदेश में 6,494 बड़े भूस्खलन दर्ज किए गए। इनमें करीब 85 प्रतिशत यानी 5,502 घटनाएं 2023 में हुईं। इस अवधि में कुल्लू में 2,676 और शिमला में 2,207 बड़े भूस्खलन हुए। चंबा में 373 और मंडी में 316 घटनाएं हुईं।
विशेषज्ञों के अनुसार भूस्खलन के लिए केवल बारिश की मात्रा को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। यह केवल ट्रिगर है। कुल्लू में 1,017.2 मिलीमीटर बारिश के बावजूद भूस्खलन सबसे अधिक हुए। पश्चिमी हिमालय की कमजोर भूगर्भीय बनावट के कारण यहां की चट्टानें और ढलानें अपेक्षाकृत संवेदनशील हैं। मूसलाधार बारिश से मिट्टी में पानी व दबाव बढ़ता है, जबकि कम समय में अत्यधिक बारिश और बादल फटने से अचानक भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
आठ साल में 6,494 बड़े भूस्खलन
2018 से 2025 के बीच प्रदेश में 6,494 बड़े भूस्खलन दर्ज किए गए। इनमें करीब 85 प्रतिशत यानी 5,502 घटनाएं 2023 में हुईं। इस अवधि में कुल्लू में 2,676 और शिमला में 2,207 बड़े भूस्खलन हुए। चंबा में 373 और मंडी में 316 घटनाएं हुईं।