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हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला: नियमितीकरण के बाद पूरी अनुबंध सेवा होगी मान्य, तीन माह में बकाया वित्तीय लाभ

Sat, 05 Sep 2026 07:11 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 05 Sep 2026 07:11 PM IST
सार
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अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कर्मचारियों की नियुक्ति भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के तहत विज्ञापन जारी कर, पूरी चयन प्रक्रिया अपनाकर और स्वीकृत पदों पर की गई है, तो नियमितीकरण के बाद उनकी पूरी अनुबंध अवधि को सेवा लाभों के लिए गिना जाएगा।

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Himachal High Court Ruling: Entire contractual service to count after regularization
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुबंध आधार पर नियुक्त कर्मचारियों के हित में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कर्मचारियों की नियुक्ति भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के तहत विज्ञापन जारी कर, पूरी चयन प्रक्रिया अपनाकर और स्वीकृत पदों पर की गई है, तो नियमितीकरण के बाद उनकी पूरी अनुबंध अवधि को सेवा लाभों के लिए गिना जाएगा। इसमें वरिष्ठता, सालाना वेतन वृद्धि, वेतन निर्धारण, पदोन्नति और पेंशन संबंधी लाभ शामिल हैं। न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के तहत हुई थी ऐसे में अनुबंध अवधि को सेवा लाभों से अलग नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता समय रहते न्यायालय की शरण में आए थे, इसलिए उन्हें प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से देय सभी वित्तीय लाभ दिए जाएं।

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अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर कर्मचारियों के बकाया वित्तीय लाभ का भुगतान किया जाए। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर बकाया राशि पर भुगतान की तारीख तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। यह फैसला मनोज कुमार, अजय कुमार और भूपेंद्र पाल की ओर से दायर विभिन्न याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई के दौरान सुनाया गया। याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2010 में जारी विज्ञापन के आधार पर भाषा अध्यापक, टीजीटी (मेडिकल) और ड्रॉइंग मास्टर के पदों के लिए आवेदन किया था। उन्होंने भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के तहत आयोजित लिखित परीक्षा और साक्षात्कार की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी की थी। इसके बावजूद सरकार ने उन्हें तत्काल नियमित नियुक्ति देने के बजाय वर्ष 2012 में 13,500 रुपये के निश्चित वेतन पर अनुबंध आधार पर नियुक्त किया। बाद में उनकी सेवाएं नियमित कर दी गईं, लेकिन अनुबंध अवधि को वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभों में शामिल नहीं किया गया। इसी को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
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बिना परमिट-फिटनेस वाहन चलाना बीमा शर्तों का मूलभूत उल्लंघन : हाईकोर्ट
 प्रदेश हाईकोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना दावों से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई भी परिवहन (कमर्शियल) वाहन बिना वैध रूट परमिट और फिटनेस सर्टिफिकेट के सार्वजनिक स्थान पर चलाया जाता है, तो यह बीमा पॉलिसी की शर्तों का मूलभूत उल्लंघन माना जाएगा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में इंश्योरेंस कंपनी को सीधे तौर पर उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि मुआवजे की असली देनदारी वाहन मालिक की होगी। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ओर से दायर एक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पे एंड रिकवर (भुगतान और वसूली) के सिद्धांत के तहत यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने आदेश दिया कि पीड़ितों के हितों की रक्षा के लिए इंश्योरेंस कंपनी पहले क्लेम की राशि का भुगतान करेगी और बाद में बिना कोई नया मुकदमा दायर किए, सीधे निष्पादन अदालत के जरिए वाहन मालिक से पूरी राशि वसूल कर सकेगी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आरटीओ कुल्लू के रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आया कि दुर्घटनाग्रस्त टाटा सूमो एक कमर्शियल मैक्सी कैब के रूप में पंजीकृत थी। इस वाहन का फिटनेस सर्टिफिकेट 6 जुलाई 2005 को ही खत्म हो चुका था और इसका रूट परमिट भी 7 अगस्त 2008 तक ही वैध था। इसके बावजूद,साल 2013 में बिना किसी दस्तावेज के इस गाड़ी को सड़कों पर दौड़ाया जा रहा था। अदालत ने कहा कि कोई भी मालिक यात्रियों, पैदल चलने वालों और आम जनता की जान-माल को जोखिम में डालकर ऐसे वाहनों को चलाने की अनुमति नहीं दे सकता।

 

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