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विधानसभा चुनाव: स्विंग वोर्टस तय करते हैं 'पंजाब की सरदारी', आप के लिए बड़ी चुनौती, क्या कहते हैं आंकड़े?

Sun, 23 Aug 2026 11:56 AM IST
शाहिल शर्मा मोहित धुपड़, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, चंडीगढ़ Published by: शाहिल शर्मा Updated Sun, 23 Aug 2026 11:56 AM IST
सार
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साल 1997 से साल 2022 के चुनावी पैटर्न को देखें तो यहां स्विंग वोटर्स काफी असरदार रहे हैं। वे मुद्दों को तरजीह देते हैं मगर नया विकल्प मिलने पर राजनीतिक बदलाव के लिए भी वोट करते हैं।
 

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Swing voters determine power in Punjab elections
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पंजाब में चुनावी चौसर सजनी शुरू हो गई है। सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। अबकी बार आम आदमी पार्टी के लिए जहां सत्ता वापसी बड़ी चुनौती रहेगी। वहीं, शिअद, कांग्रेस और भाजपा भी सत्ता तक अपनी पहुंच बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएंगे। इसके लिए सभी दलों के चुनावी रणनीतिकार अपने-अपने कामों में जुट चुके हैं।
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 पंजाब में सियासी पारा जैसे-जैसे चढ़ रहा है, मुद्दों की जमीन भी तैयार होती जा रही है। दलों ने एक-दूसरे की घेराबंदी शुरू कर दी है, तो वहीं दल-बदल के तहत पार्टियों का काम भी शुरू हो चुका है जो कि चुनाव तक चलने की संभावना है। कई प्रभावशाली नेता इधर से उधर भी हुए हैं। विभिन्न मुद्दों और मसलों पर सियासी दलों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो चुका है।
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सियासी समीकरणों और वोटरों को अपने पाले में करने के लिए सभी पार्टियां उन मुद्दों पर होमवर्क कर रही हैं, जिन्हें आगामी चुनाव में जनता के बीच ले जाना है। पंजाब के चुनाव में वोटरों का मिजाज बहुत मायने रखता। साल 1997 से साल 2022 के चुनावी पैटर्न को देखें तो यहां स्विंग वोटर्स काफी असरदार रहे हैं। वे मुद्दों को तरजीह देते हैं मगर नया विकल्प मिलने पर राजनीतिक बदलाव के लिए भी वोट करते हैं।
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पंथक सियासत का गहरा प्रभाव
सूबे में पंथक सियासत का प्रभाव दशकों से गहरा रहा है, हालांकि हाल के वर्षों में इसमें बदलाव देखे गए हैं। यह सियासत मुख्य रूप से सिख पहचान, बंदी सिखों की रिहाई, बेअदबी मामलों और एसजीपीसी के नियंत्रण जैसे धार्मिक व राजनीतिक मुद्दों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। पारंपरिक रूप से पंथक वोटों पर शिरोमणि अकाली दल का दबदबा रहा है मगर हालिया चुनावों में इस वोट बैंक में बिखराव आया है। अब राज्य का वोटर केवल पंथक मुद्दों के बजाय विकास, रोजगार और बदलाव जैसे मुद्दों को भी तरजीह दे रहा है।
 

सत्ता बदल देते हैं स्विंग वोटर्स
साल 1997 में भाजपा-अकाली गठबंधन को 40.7 प्रतिशत स्विंग वोटर्स का सहारा मिला और इस गठबंधन ने सरकार बनाई। स्विंग वोटर्स वे मतदाता होते हैं जो किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा के प्रति स्थायी रूप से वफादार नहीं होते। चुनाव के समय इनका वोट किस तरफ जाएगा, यह पहले से तय नहीं होता। ये मतदाता उम्मीदवारों की नीतियों, स्थानीय मुद्दों, काम के प्रदर्शन और तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर अपना निर्णय बदलते रहते हैं।

 साल 2002 में 13.8 प्रतिशत स्विंग वोटर्स के बूते कांग्रेस-सीपीआई गठबंधन ने सरकार बनाई। ये वोटर्स भाजपा-अकाली गठबंधन से छिटक गए। साल 2017 में 23.70 प्रतिशत स्विंग वोटर्स पंजाब की सत्ता में नई पारी खेलने वाले दल आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट हुए। इससे समीकरण बिगड़े मगर फायदा कांग्रेस को मिला। 

साल 2022 में आप को 18.29 प्रतिशत स्विंग वोटर्स की बढ़त मिली और पार्टी सत्ता में आई। इसका असर इतना ज्यादा था कि शिअद अध्यक्ष व डिप्टी सीएम रहे सुखबीर बादल जलालबाद और कांग्रेस के तत्कालीन सीएम चरणजीत सिंह चन्नी चमकौर साहिब और भदौड़ दोनों सीटों से हार गए।

एक नजर में चुनावी ट्रेंड
  • साल 1997 : शिअद को 75, भाजपा को 18 व कांग्रेस को 14 सीट। कांग्रेस के खिलाफ भारी जनादेश; अकाली-भाजपा गठबंधन का उभार।
  • साल 2002 : कांग्रेस को 62, शिअद को 41, भाजपा को 3 सीट। पांच साल की सत्ता के बाद अकाली-भाजपा सरकार के खिलाफ बदलाव।
  • साल 2007 : शिअद को 48, भाजपा को 19 व कांग्रेस को 44 सीट। कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर शिअद-भाजपा गठबंधन की वापसी
  • साल 2012 : शिअद को 56, भाजपा को 12 व कांग्रेस को 46 सीट। पहली बार लगातार। शिअद-भाजपा गठबंधन सरकार फिर सत्ता पर काबिज।
  • साल 2017 : कांग्रेस को 77, आप को 20, शिअद को 15 व भाजपा को 3 सीट। 10 साल की शिअद-भाजपा गठबंधन सरकार के खिलाफ जबरदस्त सत्ता विरोधी फेक्टर।
  • साल 2022 : आप को 92, कांग्रेस 18, शिअद को 3 व भाजपा को 2 सीट। परंपरागत दलों को दरकिनार कर तीसरे विकल्प आप को प्रचंड बहुमत।
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